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________________ उद्गमादिवडे शुद्ध मळे तो शुचि अन्यथा अशुचि भने देहशुचि ने मळशुद्धि कर्या बाद निर्लेप भने निर्गध थवाय तेम करवू ते. तेमज बीजां वस्त्रादि अचेतन द्रव्य उपकरणादि संबंधी मळ-प्रक्षालनादि विषे शास्त्रोक्त रीति मुजब वर्तवू. एटले के निर्लोभता-नि:स्पृहतारूप भावशौचने बाधक न आवे तेम सचेतन के अचेतन द्रव्य उपकरणादिनी प्रयत्नथी परीक्षा करी, मळप्रक्षालनादि विषे यथायोग्य प्रवर्तवू. १७१. ___ हवे संयम आश्री शास्त्रकार कहे छ:पञ्चास्रवाद्विरमणं पञ्चेन्द्रियनिग्रहः कषायजयः। दण्डत्रयविरतिश्चेति संयमः सप्तदशभेदः ॥ १७२ ॥ भावार्थ-हिंसादिक पंचाश्रवथी विरम, पांचे इंद्रियोनो निग्रह करवो, चार कषायोनो जय करवो अने मन, वचन अने कायाना त्रण दंडथी विरमवु एम संयम १७ प्रकारे कह्यो छे. १७२. विवेचन-पापस्थानकोथी पाछा निवर्तवु ते संयम सत्तर प्रकारनो छे. प्राणातिपातादिक जे पांच कर्माश्रवना हेतुओ छे ते थकी विरमदूं, स्पर्शनादिक पांच इंद्रियोनो निग्रह करवो, क्रोधादि चार कषायोनो जय करवो-उदय निरोध करवो अथवा उदित थयेलने निष्फळ ( फळ रहित ) करवा; तेमज मन, वचन अने कायाना दंडथी विरम, अर्थात मनथी अभिद्रोह, अभिमान, इर्ष्यादि न करवा; जीभथी निर्दय, कठोर के असत्य न बोलवू अने कायाथी जयणारहित धावनादिक क्रिया न करवी. ए रीते १७ मेदे संयम समजवो. १७२. Jain Education inteal For Personal Private Use Only mainelibrary.org
SR No.600205
Book TitlePrashamrati Prakaranam
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
Author
PublisherJain Dharm Prasarak Sabha
Publication Year1932
Total Pages240
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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