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________________ अने उपभोग करनार साधुने कदापि रोगनो भय रहेतो नथी. १३४ वि०-पिंडेपणा अध्ययनमा उद्गम उत्पादना अने एषणाना दोष रहित आहार ग्रहण करवा संबंधी अने कम्पनीय अकल्पनीय संबंधी जे विधि निश्चयथी जणाव्यो छे ते प्रमाणे आहार ग्रहण करवामां जो नियामितपणुं साचवे छ, अर्थात् जो जरूर जेटलो ज परिमित आहार व्होरी लावे छे तो ते परठवी देवो पडतो नथी. अने लावेलो आहार वापरवामां पण परिमितपणुं-नियमितपणुं साचवे छे-उणोदरी करे छ तो त्हेने कदापि अजीर्णजनित व्याधिनो भय रहेतो नथी. ए रीते प्रवर्तता मंदवाडादि न आववाथी तज्जन्य अपवाद सेवबा पडता नथी अने धर्म अनुष्ठानमा पण अंतराय थतो नथी. मतलबके अकल्प्य आहार तजीने परिमित जाहार लाववानुं अने वापरवानुं जो लक्ष राखवामां आवे छे तो साधुने कशो वांधो आवतो नथी. १३४ । उपर जणांवली हकीकतने ज वधारे स्फुट करीने बतावतां छतां शास्त्रकार कहे छ:व्रणलेपाक्षोपाङ्गवदसङ्गयोगभरमात्रयात्रार्थम् । पन्नग इवाभ्यवहरेदाहारं पुत्रपलवच्च ।। १३५ ॥ भावार्थ-संयमव्यापारनो निराबाधपणे निर्वाह करवाने ज माटे साधुए व्रणलेपनी परे, चक्रने तेलसिंचननी पेरे, अने पुत्रमांसनी पेरे, सर्पनी माफक आहारने आरोगवो जोइए. १३५. विवेचन-जेम व्रण उपर लेप, हेनी उपर रुझ श्रावी जाय एटला पूरतोज़ देवामां आवे छे, एथी अधिक लेप करवामां आवे तो ते नकामोज जाय छे; वळी चक्रनी नाभिने एटलुंज तेल के एरंडीयु प्रमुख उंजवामां आवे छे के जेथी Jan Education For Personal Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600205
Book TitlePrashamrati Prakaranam
Original Sutra AuthorUmaswati, Umaswami
Author
PublisherJain Dharm Prasarak Sabha
Publication Year1932
Total Pages240
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size19 MB
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