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________________ आ वस्तुने उपमाद्वारा समजावतां तेओ कहे छे के कूवामां पडतो कोइ माणस घास के तेवी कोइ बीजी पोची वस्तु पकडी18 बचवा इच्छे तो ते कदी न बची शके. पण मजबूत दोरी के तेवी बीजी वस्तु पकडी राखे तो खातरी थी ते बचे. तेम अपुष्ट आलंबननिमित्ते जो कोइ मूळगुणमा अतिचार सेववानुं साहस करे तो ते जरूर पतित थाय. अने पुष्ट आलंबननिमित्ते अतिचार सेवे तो ते पतित न ज थाय. जेम कोइ पैसादार अमुक पुंजी रोकी व्यापार करवा मांडे त्यारे योजनाप्रमाणे भविष्यत्मां मोटा लाभनी आशाथी ते पोतानी मूळगी पुंजीमांथी नोकरोनो दुकानभाडानो विगेरे घणो खर्च करे छे. छतां तेनो करेलो ते खर्च हेतुःपुरस्सर होवाथी भविष्यत्मा लाभर्नु कारण बने छे. तेम कोइ खास लाभनी संभावनाथी सेववामां आवेलो मूळगुणनो अतिचार पण दोषरूप न थतां लाभमां ज परिणमे छे. तेथी उलटुं कोइ धनिक पोतानी मूळगी पुंजीने गमे तेवा स्वच्छंदी मार्गोमां खर्चे तो तेने फायदोडू थवो तो दूर रह्यो, मूळगी पुंजी पण तद्दन नाश पामे. तेवी रीते कोइ साधु मनकल्पित बहार्नु काढी मूळगुणना अतिचारो सेवे तो तेने भविष्यत्मा हानि थाय, ते उपरांत पोतानुं प्रथम प्राप्त करेल चारित्र पण नाश पामे. आ प्रमाणे उपाध्यायजीए दाखलादलीलो सहित व्यवहारनिश्चयनुं स्वरूप वर्णववामा ज प्रथम उल्लासनी समाप्ति करी छे. द्वितीय उल्लास. बीजा उल्लासना आरंभमां ज गुरुनु लक्षण करतां उपाध्यायजी कहे छे के जे साधुना शुद्ध आचारने जाणे छे, प्ररूपे छे अने 8 स्वयं तेनुं पालन करे छे तेने ज गुरुना गुणथी युक्त होइ गुरु जाणवो. त्यार बाद व्यवहारतुं निरूपण करतां उपाध्यायजी कहे छे के Jain Education For Private Personal Use Only
SR No.600159
Book TitleGurutattva Vinischaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay Gani, Chaturvijay
PublisherAtmanand Jain Sabha
Publication Year1925
Total Pages540
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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