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________________ कइया वि जणयलेहेण पेरिओ पुच्छिउं ससुररायं । चउहि वि भजाहि समं, कुमरो पत्तो तिलयनयरे ॥६५॥ पणओ य जणणिजणए, इत्तो उजाणपालएण निवो । विष्णत्तो सिरिअकलंकमरिआगमणकहणेणं ॥ ६६ ।। तो भासुरभूइजुओ, सकुमारो मारसासणु व्व निवो । चलिओ गुरुनमणत्थं, रायपहे नियइ नरमेगं ।। ६७ ।। अइसलवलंतकिमिबहुलजालमच्छिन्नमच्छियाछन्नं । निक्किट्ठकुट्टसल्लिरसिरहरमइदीणहीणसरं ॥ ६८॥ तं दद्रुमणिहमरिहमंडलं पिव विसायमलिणमुहो । पत्तो गुरूण पासे, नमिउं निसुणेइ धम्मकहं ॥६९ ॥ जीवो अणाइतणुकम्मबंधसंजोगओ सया दुहिओ । भमइ अणाइवणस्सइमज्झगओ गंतपरियट्टे ॥ ७० ॥ तो बायरेसु तत्तो, तसत्तणं कह वि पावए जीवो । लहुकम्मो य तओ जइ, पावइ पंचिंदियत्तं च ॥ ७१ ॥ पुण्णविहूणो य तओ, न अज्जखित्ते लहेइ मणुयत्तं । लद्धे वि अजखित्ते, न कुलं जाई बलं रूवं ॥ ७२ ॥ एवं पि कह वि पावइ, अप्पाऊ वा हविज वाहिल्लो । दीहाउओ निरोगो, हविज जइ पुण्णजोएणं ॥ ७३ ॥ पत्ते नीरोगत्ते, दंसणनाणस्स आवरणओ य । न य पावइ जिणधम्म, विवेयपरिवजिओ जीवो ॥ ७४ ॥ लद्धण वि जिणधम्मं, दसणमोहणियकम्मउदएणं । संकाइकलुसियमणो, गुरुवयणं ने सद्दहइ ॥ ७५ ॥ अह निम्मलसम्मत्तो, जहट्टियं सद्दहेइ गुरुवयणं । नाणावरणस्सुदए, संसिजंतं न बुज्झेइ ॥ ७६ ॥ अह संसियं पि बुज्झइ, सयं पि सद्दहइ बोहए अन्नं । चारित्तमोहदोसेण संजमं न य सयं कुणइ ।। ७७ ॥ १ ° कुट्ठवसल्हसिरनहर प्रत्य० ॥ २ °अणज्ज° क । ३ °नेय° क-स्त्र । REEEXX Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600153
Book TitleDharmratna Prakaranam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyavijay
PublisherSarabhai Manilal Nawab Ahmedabad
Publication Year
Total Pages340
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size16 MB
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