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धर्मरत्नप्रकरणम् ५३
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कुमरेण वि तह विहिए, सा जंपइ निवडणो हिययदद्दया । मालइनामा देवी, भवस्स गंगेव सुपसिद्धा || ७ | सा तुह दंसणगुणसवणपउणमयणुग्गअग्गिसंतत्ता । सिच्चउ कुमर ! वराई, तुमए नियसंगमजलेण ॥ ८ ॥ तं सुणिय चिंतह इमो, अहह अहो मोहमोहिया जीवा । इह परलोयविरुद्धे वि कहमकज्जे पयति ।। ९ ।। इय सविसाओ चिंतिय, तं धाई भणइ नरवरंगरुहो । मज्झत्था होऊणं, मह वयणं सुणसु खणमेगं ॥ १० ॥ परनरमित्ते वि कुलंगणाण जुत्तो न होड़ अणुराओ । जो पुण पुत्ते त्रि इमो, सो अह दूरं चिय विरुद्धो ॥। ११ ॥ सुकुलुब्भवनारीओ, परपुरिसं चित्तभित्तिलिहियं पि । रविमंडलं व दट्टु दिट्ठि पडिसंहरंति लहुं ॥ ॥ १२ ॥ अविच्छिन्न कण्ण करचरणनासमवि वाससयगपरिमाणं । परपुरिसं कुलनारी, आलवणाईहि वज्जेइ ॥ १३ ॥ इय भणिय तेण धाई, विसज्जिया तीइ कहइ सा सव्वं । तहवि हु अठायमाणी, सा पेसइ दुइमन्नन्नं ॥ १४ ॥ तत्तो विसन्नचित्तो, चिंतर कुमरो हणेमि किं अप्पं १ | अहवा परघाओ विव, पडिसिद्धो अप्पघाओ वि ।। १५ ।। जय कहिज्जइरण्णो, इमा वराई तओ विणस्सेइ । ता देसंतरगमणं जुत्तं मे सयलदोसहरं ।। १६ ।। इय वीमंसिय हियए, करकलियकरालकालकरवालो । नयरीओ निक्खंतो कुमरो जा जाइ किंपि भुवं ॥ १७ ॥ ता मिलिओ तस्सेगो, दिओ भगइ कुमर ! ऽहं गमिस्सामि । सिरिसंडिन्भाविसइकमंडणे नंदिपुरनयरे ।। १८ ।। कुमरो वि आह अहमवि, तत्थेव गमी अहो सुसत्थु ति । इय बुत्तु दोवि चलिया, अग्गे मग्गे अणुव्विग्गा ॥ १९ ॥ अह उच्छुरिओ बहुसिल्लभल्लदुल्ललियभिल्लसंघजुओ । पल्लिवई वज्जभ्रुओ, इय भणिओ तेण निवतणओ ॥
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गुणराग गुणः १२
तत्र पुरन्दर राजर्षिकथा
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