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स०८०
श्रीस्थानाक
सूत्रदीपिका वृत्तिः ।
॥६॥
शुक्लानां वा आस्तिकत्वेन विशुद्धानां पक्षो-वर्गः शुक्लपक्षस्तत्र भवाः शुक्लपाक्षिकाः, तद्विपरीतास्तु कृष्णपाक्षिका इति १५, चरमदण्डके येषां स नारकादिभवश्वरमः पुनस्तेनैव नोत्पत्स्यन्ते सिद्धिगमनात् ते चरमाः, अन्ये त्वचरमा इति १६, एवमेते आदितोऽष्टादश दण्डकाः। प्राय वैमानिकाचरमाचरमत्वेनोक्ताः, ते चावधिनाऽधोलोकादीन् विदन्त्यतस्तद्वेदने जीवस्य प्रकारद्वयमाह
दोहि ठाणेहि आया अहोलोग जाणइ पासइ त-समोहएण चेव अप्पाणेण आया अहेलोग जाणइ पासइ असमोहपण चेव अप्पाणेण' आया अहेलोग जाणइ पासइ, आहोहि समोहयासमोहपण चेव अप्पाणेण आया अहेलोग जाणइ पासइ; एवं तिरियलोग २ उइढलोग ३ केवलकप्प लोग ४। दोहि ठाणेहि आया अहोलोग जाणइ पासइ त. विउविएण चेव अप्पाणेण आया अहोलोग जाणइ पासइ अविउविवरण चेव अप्पाणेण आया अहोलोग जाणा पासइ आहोहि विउव्वियाविउविएण चेय अप्पाणेण आया अहोलोग जाणइ पासइ १, एवं तिरियलोग उइढलोग०४ दोहि ठाणेहि आया सद्दाइ सुणेइ त०-देसेणवि आया सद्दाइ सुणेइ सम्वेणवि आया सद्दाइ सुणेइ, पवं रूवाई पासइ, गधाइ अग्घाई, रसाई आसापड, फासाइ पडिस वेदेइ ५। दोहि ठाणेहि आया ओभासइ, त.. देसेणवि आया भोभासह सवेणवि आया आभासह, पवं पभासद, विउब्वेइ, परियारेइ, भासं भासइ, आहारेड, परिणामेह, वेदेइ, णिजरेइ ९ । दोहि ठाणेहि देवे सहाईसुणेइ, तं०-वेसेणवि देवे सहाई सुणेइ सव्येणवि देवे सहाई सुणेइ जाव जिरेड १४ । मरुया देवा दुविहा ५० त०-पगसरीरे चे दुसरीरे चेब, एवं किनरा किंपुरिसा गधव्वा नागकुमारा सुवन्नकुमारा अग्गिकुमारा वायुकुमारा ८, देवा दुमिहा ५० त०-एगसरीरा चेव बिसरीरा चेव । (सू० ८०) बिट्ठाणस्स बीओ उद्दसो सम्मत्तो २-१ । 'दोही त्यादि सूत्रचतुष्टयं, द्वाभ्यां स्थानाभ्या' प्रकाराभ्यामात्मगताभ्यामात्मा-जीवोऽधोलोकं जानात्यवधिज्ञानेन
॥६॥
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