SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 53
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ - MASSACREACOCCAG जक्खपिसायमहोरगगंधवा साम किन्नरा नीला। रक्खसकिंपुरिसाविअ, धवला भूआ पुणो काला ॥ ३४ ॥ व्याख्या-यक्षपिशाचमहोरगगन्धाः श्यामाः किञ्चित्कृष्णाः, किन्नराः श्यामा अपि किश्चिन्नीलाः, राक्षसाः किंपुरुषाश्च धवलाः, भूताः पुनः कालाः ॥ ३४ ॥ इहान्येऽपि रत्नप्रभाया उपरितने योजनशतेऽष्टौ व्यन्तरविशेषाणां निकायाः सन्ति, अतस्तान्गाथाद्वयेनाह अणपन्नी पणपन्नी, इसिवाइअ भूअवाइए चेव । कंदी अ महाकंदी, कोहंडे चेव पयए अ॥३५॥ इअ पढमजोअणसए, रयणाए अह वंतरा अवरे। तेसु इह सोलसिंदा, रुअग अहो दाहिणुत्तरओ ॥ ३६ ॥ सुगम, नवरं रुचको-मेरुमध्यस्थितोऽष्टप्रदेशात्मको गोस्तनाकारः, एकैकस्मिंश्च निकाये द्वयोयोरिन्द्रयोर्भावादत्र षोडश इन्द्रा भवन्ति । तथाच स्थानाङ्गसूत्रम्-"दो अणपन्निंदा पन्नत्ता, तंजहा-सन्निहिए चेव सामाणे चेव, दो है पणपनिंदा पं०२०-धाए चेव विहाए चेव, दो इसिवाइंदापं०२०-इसी चेव इसिवालिए चेव,दो भूयवाइंदा पं० तं० Jain Education For Privale & Personal use only N w .jainelibrary.org
SR No.600134
Book TitleSangrahani Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLalitvijay
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1915
Total Pages292
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size13 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy