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________________ Jain Educa सुलभचरणपाणियत्तणेण गावीओ चरंति, तेण सा गोभूमी बुचइ । तत्थ य कलहपियत्तणेण गोसाली गोवालए भणइ - अरे मिलिच्छा ! जुगुच्छणिजरुवा ! एस मग्गो कहिं वच्चइ ?, गोवेहिं भणियं - अरे पासंडिया ! कीस अम्हे निकारणं अकोसेसि ?, सो भणइ - दासीपुत्ता ! पसुयपुत्ता ! जइ न मरिसिहिह ता सुअरं अक्कोसिस्सामि, किं अलियमेयं १, मिच्छजाइया एरिसगा चेत्र तुब्भे, किं जहट्ठियंपि न भणिस्सामि ?, को मे तुम्ह पडिभओत्ति, तओ तेहिं समुप्पन्नगाढको वेहिं मिलित्ता पहिमुठ्ठिलेहिं विद्दवित्ता बद्धो वंसीगहणे य पक्खित्तो, तत्थवि पुचना एण करुणाए पहियजणेण विमोइयंमि गोसाले तिहुअणगुरू रायगिहे नयरे अट्टमवासारतं काउमुवसंपज्जइ, विचित्ताभिग्गहसणाहं च चाउम्मासखमणं आरंभेइ । तस्स पजंते बहिया आहारग्गहणं कुणइ । तओ अणिजरियं अज्जवि बहुं कम्मं अच्छइत्ति चिंतिऊण पुणोऽवि सामी अत्थारियादिद्वैतं परिभाविंतो कम्मनिज्जरणनिमित्तं अचंतपावजण संगएसु लाढावजभूमिसुद्धभूमिनामेसु मिलिच्छदेसेसु गोसालेण समेओ विहरिओ । तत्थ य ते अणारिया कयाइ असुणियधम्मक्खरा निरणुकंपा लोहियपाणिणो परमाहम्मियासुरसरूवा भयवंतं विहरमाणं पासित्ता हीलंति निंदंति तहाविहप्पयारेहिं विद्दर्विति, साणादओ यदुसत्ते सामिस्स अभिमुहं मुयंति । अवि यजह पविरेयणतणुतयतच्छणखारोव लेवपामोक्खं । किच्छविगिच्छं विजं कुर्णतमभिनंदए रोगी ॥ १ ॥ तह जयनाहोवि समग्गमुग्गउवसग्गकारयं लोयं । उवयारिबंधुवुद्धीए बंधुरं पेहइ पहिट्ठो ॥ २ ॥ ernational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600114
Book TitleMahavir Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGunchandra
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1929
Total Pages704
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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