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________________ श्रीगुणचंद महावीरच० ४ प्रस्तावः ॥७३॥ SUSAGASHG09LUSTUS | जे पुचपुरिसवंसप्परोहगाढप्परूढमूलसमं । वेरिकुलकमलनिद्दलणकुंजरं सयलगुणनिलयं ॥१॥ नरसिंहस्स पुत्तं ठविडं नियए पयंमि पडिवन्नसंजमुज्जोगा। इह परभवे य कह ते पावितिन निवुइं पुरिसा?॥२॥ (जुम्म) सुतचिन्ता. एवं च सोचा चितियं रन्ना-अहो दुलंभमेय, जओ मम एत्तियकालेऽवि पउरासुवि पणइणीसुन एकस्सवि कुलालंबणस्स पुत्तस्स लाभो जाओ, अच्छउ सेसं, एवं ठिए य किं करेमि? किं समाराहेमि?, कत्थ वच्चामि ? कस्स है साहेमि? को उवाओ ? के वा एरिसकजे सहाया? को य मे पुरिसयारो ? का वा पुवकम्मपरिणइत्ति खणं किं-14 कायचयमूढयं अणुभविय तवेलं चेव अंगीकयसत्तभावो एवं सम्मं परिभाविउं पवत्तो परलोयपवत्ताणं जइवि सुएहिं न होइ साहारो । जं सर्वसय उवरिं गओवि नगओ दुहं कुणइ ॥१॥ तहविय पुवनराहिवसंतइवुच्छेय दुक्खमक्खिवइ। मज्झ मणो पुबनरिंदरक्खिओ कुरुजणवओ य॥२॥ (जुम्म)| एत्यंतरे जायाई समुड्डियभारंडकारंडवहंसचक्कवायकुलकोलाहलाउलियाई दिसिमुहाई वियलंतपमापसरो विच्छाईभूओ तारयानियरो पसरिया सिंदुररेणुपुंजपिंजरा सूरसारहिपमा ताडियाई पडहमुरवझलरिभंभाभेरीभंकार-2॥७३॥ भासुराई पभायमंगलतूराइं समुग्गओ कमलसंडपयंडजडविच्छडखंडणुडामरकरपसरो दिणयरो, तो उठ्ठिऊण स-1 यणिज्जाओ निस्सरिओ वासभवणाओ कयपाभाइयकिचो अंगरक्खपीढमद्दप्पमुहपहाणपरियणाणुगओ अत्थाणीमंडवे, |गंतूण राया अणेगमणिकिरणविच्छुरियंमि सूरोव पुवपवयसिहरंमि कणयसिहासणंमि निविट्ठो, तयणंतरं च ठियाओ Jain Educat jainelibrary.org For Private & Personal Use Only i onal
SR No.600114
Book TitleMahavir Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGunchandra
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1929
Total Pages704
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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