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जो देवाणवि ९ उजिंतसेल १० चत्तारि अट्ठ दस दो य ११ । वेयावच्चगराण य १२ अहिगारुलिंगणपयाई ॥८६॥ | पढमे छडे नवमे दसमे एक्कारसे य भावजिणे । तइयंमि पंचमंमि य ठवणजिणे सत्तमे नाणं ॥ ८७॥ अट्ठमबीयचउत्थेसु सिद्धदबारिहंतनामजिणे । वेयावच्चगरसुरे सरेमि बारसमअहिगारे ॥ ८८॥ साहूण सत्त वारा होइ अहोरत्तमज्झयारंमि । गिहिणो पुण चिइवंदण तिय पंच य सत्त वा वारा ॥८९॥ पडिकमणे चेइहरे भोयणसमयंमि तह य संवरणे । पडिकमणे सुर्यण पडिवोहंकालियं सत्तहा जइणो ॥ ९॥ पडिकमओ गिहिणोवि हु सत्तविहं पंचहा उ इयरस्स । होइ जहण्णेण पुणो तीसुवि संझासु इय तिविहं ॥९१॥ नवकारेण जहन्ना दंडकथुइजुयल मज्झिमा नेया। उक्कोसा विहिपुवगसक्कथय|पंचनिम्माया ॥९२॥१द्वारम् ॥
मुहणतयदेहीऽऽवस्सएसु पणवीस हंति पत्तेयं । छट्ठाणा छच्च गुणा छच्चेव हवंति गुरुवर्यणा ॥ ९३ ॥ अहिगारिणो |य पंच य इयरे पंचेवे पंच पडिसेहो। एकोऽवग्गह पंचाभिहाणे पंचेव आहरणा ॥ ९४ ॥ आसायण तेत्तीसं दोसी बत्तीस कारणा अट्ठ । बाणउयसयं ठाणाण वंदणे होइ नायचं ॥ ९५॥ दिद्विपडिलेहणेगा नव अक्खोडा नवेव पक्खोडा। पुरिमिल्ला छच्च भवे मुहपुत्ती होइ पणवीसा ॥ ९६ ॥ बाहूसिरमुहहियये पाएसु अ हुंति तिन्नि पत्तेयं । पिट्ठीइ हुंति चउरो . | एसा पुण देहपणवीसा ॥१७॥दुओणयं अहाजायं, किइकम्मं बारसावयं। चउँस्सिरं तिगुत्तं च, दुपवेसं एगनिक्खमणं ॥९॥ इच्छा य अणुण्णवणा अबाबाहं च जत्त जवणा य । अवराहखामणावि य छट्ठाणा हुंति वंदणए ॥ ९९ ॥ विणओवयार माणस्स भंजणा पूअणा गुरुजणस्स । तित्थयराण य आणा सुयधम्मोराहणाऽकिरिया ॥१०॥ छंदेणऽणुजाणामि तहत्ति
मनकामना
पंचाभिहाणे पंचव पडिलेहणेगा नव अक्षय । पिट्टीइ हुंति चाहा
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