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श्री नवपदवृत्तौ अदचाहाने
॥ १३७
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य। नो अस्था सुसमत्था रक्खंति जमेण हीरंतं ॥ ९० ॥ ता अम्हाणवि एसो न पहुप्पइ जा अकज्जपडियारो । अवियाणियआगमणो जमराओ सव्वनासयरो ॥ ९९ ॥ तावुज्जमं करेमो सुंदरि ! सव्वन्नुभासिए घम्मे । बहुविह| जम्मणजरमरणरोग सोगाइ अंतयरे ॥ ९२ ॥ तीए वृत्तं तुमए जं दिडं विसयनिरभिलासितं । तं चिय इमेण वेरग्गहे - उणा पोढयं नीयं ॥ ९३ ॥ जम्हा निमित्तमित्तेण चैव बुज्झंति केवि कयउण्णा । जेसिं जिणिदधम्मो, सुपरिचिओ पुत्र जम्मंमि ॥ ९४ ॥ ता जुत्तं चिय एवं कीरउ मज्झपि अणुमयं नाह ! | तुज्झाणुमग्गलग्गा लंघिस्सम हंपि | भवजलहिं ॥ ९५ ॥ एवं च तीऍ वयणं, सोउं संजायबहलरोमंचो । पिइमाइजणं आपुच्छिऊण तेर्हिपिऽणुण्णाओ | ॥ ९६ ॥ महया च्छिणं कारावियजिर्णिद्भवणमहमहिमो । दीणाणाहपयट्टियदाणो संघस्स कयपूओ ॥ ९७ ॥ सुट्टियसूरिसमीचे निक्खंतो से पियाऽवि पडिवण्णा । समणत्तं तस्सेव य महत्तराए समीमि ॥ ९८ ॥ चरिऊण चिरं कालं कलंकमुक्कं तओ समणधम्मं । आराहियविहिमरणाई दोऽवि पत्ताई सुरलोयं ॥ ९९ ॥ एवं जहा सो किर नागदत्तो, अदत्तदाणाइ नियत्तचित्तो । इहन्नजम्मे य सुहिक्कठाणं, जाओ तहऽन्ने य भवंतु सत्ता ॥ २०० ॥ ॥ इति नागदत्ताख्यानकं समाप्तमिति ॥
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नागदत्त कथा.
॥ १३७ ॥
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