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________________ 2-6 श्रीपञ्चव. १प्रव्रज्या सूत्रे पुण्यवतां दीक्षा ॥२४८॥ गाए जायइ संपत्ती त पति नो पडिछुट्टा । सा चेव तह (ण) मायणुत्तराणं विइवय३०॥ CASSAMACHAR परिसुद्धं पुण एअंभवविडविनिबंधणेसु विसएसुं। जायइ विरागहेऊ धम्मज्झाणस्स य निमित्तं ॥ १९४ ॥ जं विसयविरत्ताणं सुक्खं सज्झाणभाविअमईणं । तंमुणइ मुणिवरो चिअ अणुहवउ न उण अन्नोऽवि॥१९॥ कंखिजइ जो अत्थो संपत्तीए न तं सुहं तस्स । इच्छाविणिवित्तीए जं खलु बुद्धप्पवाओऽअं॥१९६॥ मुत्तीए वभिचारो तं णो जं सा जिणेहिं पन्नत्ता । इच्छाविणिवित्तीए चेव फलं पगरिसं पत्तं ॥ १९७॥ जस्सिच्छाए जायइ संपत्ती तं पडुचिमं भणिअं । मुत्ती पुण तदभावे जमणिच्छा केवली भणिया॥१९८॥ पढमंपि जा इहेच्छा सावि पसत्यत्ति नो पडिक्कुटा । सा चेव तहा हेऊ जायइ जमणिच्छभावस्स ॥१९९॥ भणिअंच परममुणिहिं (महासमणो) मासाइदुवालसप्परीआए । वय (ण) मायणुत्तराणं विइवयई तेअलेसंति तेण परं से सुक्क सुक्कभिजाई तहा य होऊणं । पच्छा सिज्झइ भयवं पावइ सव्वुत्तमं ठाणं ॥ २०१॥ लेसा य सुप्पसत्था जायइ सुहियस्स चेव सिद्धमिणं। इअ सुहनिबंधणं चिअपावं कह पंडिओभणइ ?॥२०२॥ तम्हा निरभिस्संगा धम्मज्झाणंमि मुणिअतत्ताणं । तह कम्मक्खयहेउं विअणा पुन्नाउ निद्दिट्टा ॥ २०३॥ न य एसा संजायइ अगारवासंमि अपरिचत्तंमि । नाभिस्संगेण विणा जम्हा परिपालणं तस्स ॥ २०४॥ आरंभपरिग्गहओ दोसा न य धम्मसाहणे ते उ । तुच्छत्ता पडिबंधा देहाहाराइतुल्लं तु ॥ २०५॥ तम्हा अगारवासं पुन्नाओं परिचयंति धीमंता । सीओदगाइभोगं विवागकडुति न करिति ॥ २०६॥ केइ अविजागहिआ हिंसाईहिं सुहं पसाहति । नो अन्ने ण य एए पडुच जुत्ता अपुत्व (पण)त्ति ॥ २०७॥ ॥२४८॥ Jain Educati o ला nal For Private Personal Use Only Finelibrary.org
SR No.600102
Book TitlePanchvastuka Granth
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1927
Total Pages630
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size13 MB
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