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________________ ५ प्रतिपत्तौ सूक्ष्माल्प बहुत्वं उद्देशः २ सू०२३३ श्रीजीवा- प्यन्तरं वक्तव्यं, यथा चेयमौधिकी सप्तसूत्री उक्ता स्थाऽपर्याप्त विषया सप्तसूत्री पर्याप्तविषया च सप्तसूत्री वक्तव्या, नानात्वाभावात्॥ जीवाभिसाम्प्रतमेतेषामल्पक्हुत्वमाहमलयगि- एवं अप्पाबहुगं, सव्वत्थोवासुहुमतेउकाइया सुहुमपुढविकाइया विसेसाहिया सुहुमाउबाऊविरीयावृत्तिः सेसाहिया सुहमणिओया असंखेजगुणा सुहुमवणस्सतिकाइया अणंतगुणा सुहमा विसेसाहिया, एवं अपजत्तगाणं, पजत्तगाणवि एवं चेव ॥ एतेसि णं भंते! सुहमाणं पजत्तापज्जत्ताणं कयरे०१, ॥४१५॥ सव्वत्थोवा मुहमा अपजत्तगा संखेजगुणा पजत्तगा एवं जाव सुहमणिगोया॥ एएसि णं भंते! सुहमाणं सुहमपुढविकाइयाणं जाव सुहमणिओयाण य पजत्तापजत्ता कयरे २१, सव्वत्थोवा सुहुमतेउकाइया अपज्जत्तगा सुहमपुढविकाइया अपजत्तगा विसेसाहिया सुहुमआउअपनत्ता विसेसाहिया सुहुमवाउअपजत्सा विसेसाहिया सुहुमतेउकाइया पज्जत्तगा संखेजगुणा सुहुमपुढविआउवाउपजत्तगा विसेसाहिया सुहमणिओया अपजत्तगा असंखेनगुणा सुहमणिओया पजसगा संखेजगुणा सुहुमवणस्सतिकाइया अपज्जत्सगा अणंतगुणा सुहमअपज्जत्ता विसेसाहिया सुहुमवणस्सइपज्जत्सगा संखेजगुणा सुहमा पजत्सा विसेसाहिया ॥ (सू०२३३) 'एएसि णमित्यादि, सर्वस्तोकाः सूक्ष्मतेजस्कायिकाः, असङ्ख्येयलोकाकाशप्रदेशप्रमाणत्वात् , तेभ्यः सूक्ष्मपृथिवीकायिका विशेषा-1 |धिकाः, प्रभूतासङ्ख्येयलोकाकाशप्रदेशपरिमाणत्वात् , सेभ्यः सूक्ष्माकायिका विशेषाधिकाः, प्रभूततरासङ्ख्येयलोफाकाशप्रमाणत्वात् , ॥४१५॥ Jain Education Intel For Private Personel Use Only K ainelibrary.org
SR No.600089
Book TitleJivajivabhigamopanga Sutra
Original Sutra AuthorChaturdash Purvadhar
AuthorMalaygiri
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1919
Total Pages938
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_jivajivabhigam
File Size20 MB
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