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उत्तराध्य. विवक्षितक्षेत्रावस्थितेः प्रच्युतानां पुनस्तत्मासेर्व्यवधानमेतद्-उक्तरूपं व्याख्यातं, तेषां हि विवक्षितक्षेत्रावस्थिति-जीवाजीद
प्रच्युतानां कदाचित्समयावलिकादिसङ्ख्यातकालतोऽसंख्यातकालाद्वा पल्योपमादेर्यावदनन्तकालादपि सम्भवतीति बृहद्वृत्तिः
विभक्तिः सुत्रत्रयार्थः॥ एतानेद भावतो विधातुमाह॥६७५॥
वनओ गंधओ चेव, रसओ फासओ तहा। संठाणओ य विन्नेओ, परिणामो तेसि पंचहा ॥१५॥ वन्नओ परिणया जे उ, पंचहा ते पकित्तिया । किण्हा नीला य लोहिया, हालिद्दा सुकिला तहा ॥ १६॥ गंधओ परिणया जे य, दुविहा ते वियाहिया। सुन्भिगंधपरिणामा, दुब्भिगंधा तहेव य॥१७॥ रसओ परिणया |जे उ, पंचहा ते पकित्तिया । तित्त कडुयकसाया, अंबिला महरा तहा ॥१८॥ फासओ परिणया जे उ,
अट्टहा ते पकित्तिया । कक्खडा मउया चेव, गुरुया लहुया तहा ॥ १९॥ सीया उण्हा य निद्धा य, तहा लुक्खा य आहिया । इति फासपरिणया एए, पुग्गला समुदाहिया ॥२०॥ संठाणपरिणया जे उ, पंचहा
ते पकित्तिया । परिमंडला य वहा य, तंसा चउरंसमायया ॥ २१॥ वण्णओ जे भवे किण्हे, भइए से उ ४ गंधओ। रसओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि य ॥२२॥ वण्णओ जे भवे नीले, भइए से उ गंधओ।
रसओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि य ॥ २३ ॥ वण्णओ लोहिए जे उ, भइए से उ गंधओ । रसओ फासओ चेव, भइए संठाणओवि य॥ २४ ॥ वण्णओ पीअए जे उ, भइए से उ गंधओ। रसओ फासओ
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