________________
अनुयो०
मलधा
रीया
॥ १२४ ॥
Jain Education
णामे उदइएउवसमिएखओवसमियनिप्फण्णे ?, उदइएत्ति मणुस्से उवसंता कसाया खओवसमिआई इंदिआई, एस णं से णामे उदइएउवसमिएखओवसमनिप्फण्णे २, कयरे से णामे उदइएउवसमिए पारिणामिअनिष्फण्णे ?, उदइएत्ति मणुस्से उवसंता कसाया पारिणामिए जीवे, एस णं से णामे उदइए उवसमिएपारिणामिअनिष्फण्णे ३, कयरे से णामे उदइएखइएखओवसमनिष्फण्णे ?, उदइपत्ति मणुस्से खइअं सम्मत्तं खओवसमिआई इंदिआई, एस णं से णामे उदइएखइएखओवसमनिप्फण्णे ४, करे से णामे उदइएखइए पारिणामिअनिप्फण्णे ?, उदइएत्ति मणुस्से खइअं सम्मत्तं पारिणामिए जीवे, एस णं से नामे उदइएखइएपारिणामिअनिप्फण्णे ५, कयरे से णामे उदइएखओवसमिएपारिणामिअनिप्फण्णे ?, उदइपत्ति मणुस्से खओवसमिआई इंदिआई पारिणामिए जीवे, एस णं से णामे उदइएखओवसमिए पारिणामिनिफणे ६, कयरे से णामे उवसमिएखइएखओवसमनिष्फण्णे ?, उवसंता
For Private & Personal Use Only
वृत्तिः
उपक्र
माधि०
॥ १२४ ॥
w.jainelibrary.org