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________________ SAMSUNSSSSSSSSES विधिप्रपायां "खमासमणदुगेणं सज्झायं च संदिसाविअ पुणो वंदिअ नवकारद्वगं भणइ" इत्यादि, इत्थमेव श्रीतरुणप्रभसूरिभिः षडावश्यकबालावबोधे, तथाहि-"इरियावही पडिक्कमी तओ पछइ विस्तरतउ द्वादशावर्तवंदनक देइ करी प्रत्या ख्यान कीजइ संक्षेपइ, तओ पछइ एक खमासमणि सज्झाय संदिसाविय बीअ खमासमणि सज्झाय कही तइय खमास-IG है मणपूर्वक आठ नमस्कार कही पछइ एक खमासमणे कट्ठासणं संदिसाविय बीअ खमासमणे कट्ठासणं पडिगाहेमि २ कही तइअ खमासमणी पांगुरणं संदिसाविय कही चउत्थ खमासमणी पांगुरणं पडिगाहेमि कही करी, बइसइ एतलइ सांध्य सामायिक करण विधि हयउ, सवारइ पुणि इरियावही पडिक्कमी पछइ पहिलं खमासमण देइ कट्ठासणं संदिसाविय बीयखमासमण देइ कट्ठासणं पडिगाहेमि, पछइ खमासमण देइ सज्झायं संदिसाविय खमासमण देइ सज्झायं करेमि आठ | नवकार कही पछइ खमासमण देइ पांगुरणं संदिसाविय खमासमण देइ पांगुरणं पडिगाहेमि कहई", इति ॥ ॥इति सामायिकग्रहणे ८ नमस्कारैः स्वाध्यायकरणाधिकारः ॥ ३१॥ ननु-प्राभातिकक्रियायां उपधिप्रतिलेखनादिक्षमाश्रमणदानानन्तरं साधवः श्राद्धाश्च सर्वेऽपि प्रथमं कम्बलं पश्चात् वस्त्रादि प्रतिलेखयन्ति, सायन्तनक्रियायां तु प्रथम वस्त्रं ततः कम्बलं तत्कुत्र प्रतिपादितं अस्ति ? उच्यते-विधिप्रपायां 8 तथा च तत्पाठ:-"पुणो मुहपोत्तिं पडिलेहित्ता खमासमणदुगेण उवहि पडिलेहणं संदिस्साविय कंबलवत्थाइ, अवरण्हे पुण वत्थकंबलाइ पडिलेहेई" इत्येवं पोषधविधिप्रकरणादिषु अपि ज्ञेयं, वैपरीत्ये तु कारणं बहुश्रुता एव विदन्ति ॥ ॥ इति कम्बलवस्त्रादिप्रतिलेखने प्रभाते सन्ध्यायां च विशेषाधिकारः॥ ३२॥ 143 Forte & Personal Use Only Jain Education in W w.jainelibrary.org W
SR No.600047
Book TitleSamacharishatakama
Original Sutra AuthorSamaysundar
Author
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year1939
Total Pages398
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size21 MB
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