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________________ ८६ ] काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व इन तेरह अनुयोगद्वारोंसे स्थितिबन्धका और भी विशेष वर्णन किया गया है । छक्खंडागम पदनिक्षेप - वृद्धि, हानि और अवस्थानरूप तीन पदोंके द्वारा स्थितिबन्धके वर्णन करने को पदनिक्षेप कहते हैं । इस अनुयोगद्वारमें यह बतलाया गया है कि यदि कोई एक जीव प्रथम समय में अपने योग्य जघन्य स्थितिका बन्ध करता है और द्वितीय समय में वह स्थितिको बढ़ाकर बन्ध करता है, तो उसके बन्धमें अधिकसे अधिक कितनी वृद्धि हो सकती है और कमसे कम कितनी वृद्धि हो सकती है। इसी प्रकार यदि कोई जीव प्रथम समय में उत्कृष्ट स्थितिबन्धको करके अनन्तर समय में वह स्थितिको घटाकर बन्ध करता है, तो उस जीवके बन्धमें अधिक से अधिक कितनी हानि हो सकती है और कमसे कम कितनी हानि हो सकती है वृद्धि और हानि होनेके बाद जो एकसा समान स्थितिबन्ध होता है, उसे अवस्थित बन्ध पदनिक्षेपका समुत्कीर्तना, स्वामित्व और अल्पबहुत्व इन तीन अनुयोगद्वारोंसे वर्णन । कहते हैं । इस किया गया है । वृद्धि - इस अनुयोगद्वार में षड्गुणी वृद्धि और हानिकेद्वारा स्थितिबन्धका विचार भुजाकार बन्धके समान तेरह अधिकारोंसे किया गया है । अनुभागबन्धकी प्ररूपणा चौवीस अनुयोगद्वारोंसे करने के बाद भुजाकार, पदनिक्षेप, वृद्धि और स्थान इन चार अनुयोगद्वारोंसे भी अनुभागकी प्ररूपणा की गई है । भुजाकारादि तीन का स्वरूप तो स्थितिबन्धके समान ही जानना चाहिए। केवल यहां स्थितिके स्थानपर अनुभाग कहना चाहिए। इन तीन अनुयोगद्वारोंसे अनुभागबन्धकी प्ररूपणा करनेके पश्चात् स्थान - अनुयोगद्वारमें अनुभागबन्धके कारणभूत अध्यवसानस्थानोंकाभी अनन्तरोपनिधा, परम्परोपनिधा और तीव्रमन्दता आदि अनेक अनुयोगद्वारोंसे अनुभाग सम्बन्धी अनेक सूक्ष्म बातोंकी विस्तृत प्ररूपणा की गई है। प्रदेशबन्धकी प्ररूपणा चौवीस अनुयोगद्वारोंसे करनेके पश्चात् भुजाकार, पदनिक्षेप, वृद्धि, अध्यवसान समुदाहार और जीवसमुदाहार इन पांच अनुयोगद्वारोंसे भी प्रदेशबन्धकी प्ररूपणा की गई है । भुजाकारादि तीनका स्वरूप पूर्ववत् है । केवल यहांपर अनुभाग के स्थानपर प्रदेश जानना चाहिए । अध्यवसानसमुदाहारमें प्रदेशबन्ध स्थानोंकी और उनके कारणभूत योगस्थानोंके परिणाम और अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा की गई है । जीवसमुदाहारमें उक्त दोनोंकी प्ररूपणा प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंके आधारसे की गई है । इस प्रकार भगवान् भूतबलिने प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्धका निरूपण बहुत विस्तार के साथ किया है, इसलिए इस छठे खण्डका नाम 6 महाबन्ध' प्रसिद्ध हुआ Į Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org:
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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