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________________ प्रस्तावना [ ८५ जीवोंके औदायिक भाव होता है । उत्तर प्रकृतियोंके बन्ध करनेवाले जीवोंके औदयिक भाव होता है और उनमें गुणस्थानोंकी अपेक्षा जहां जितनी वा जिन प्रकृतियोंका बन्ध नहीं होता, उनके अबन्धकी अपेक्षा यथासम्भव औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक भाव होता है। इसी प्रकार स्थितिबन्ध आदिके बन्ध करनेवाले जीवोंके भी भावोंका वर्णन ओघ और आदेशकी अपेक्षा किया गया है। [२४] अल्पबहुत्वप्ररूपणा- इस अनुयोगद्वारमें चारों प्रकारके बन्ध करनेवाले जीवोंके अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा स्वस्थान और परस्थानकी अपेक्षा दो प्रकारसे की गई है। जैसे स्वस्थानकी अपेक्षा चक्षुदर्शनावरणादि चारों दर्शनावरण प्रकृतियोंके अबन्धक जीव सबसे कम हैं । उनसे निद्रा-प्रचलाके अबन्धक जीव विशेष अधिक हैं । उनसे स्त्यानत्रिकके अबन्धक जीव विशेष अधिक हैं। उनसे उन्हीं स्त्यानत्रिकके बन्धक जीव अनन्तगुणित हैं। उनसे निद्रा-प्रचलाके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। उनसे चक्षुदर्शनावरणादि चारों प्रकृतियोंके बन्धक जीव विशेष अधिक है। जैसे यह दर्शनावरणीयकर्मका स्वस्थान अल्पबहुत्व कहा है, इसी प्रकार सभी कोंके स्वस्थान अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा की गई है। परस्थान अल्पबहुत्वकी अपेक्षा आहारद्विकका बन्ध करनेवाले जीव सबसे कम हैं। उनसे तीर्थंकर प्रकृतीके बन्धक जीव असंख्यात गुणित हैं, उनसे मनुष्यायुके बन्धक जीव असंख्यात गुणित हैं । उनसे नरकायुके बन्धक जीव असंख्यातगुणित हैं । उनसे देवायुके बन्धक जीव असंख्यातगुणित हैं। उनसे देवगतिके बन्धक जीव संख्यात गुणित हैं। उनसे नरकगतिके बन्धक जीव संख्यात गुणित हैं। उनसे वैक्रियिक शरीरके बन्धक जीव विशेष अधिक हैं। उनसे तिर्यग्गायुके बन्धक जीव अनन्तगुणित हे । इत्यादि प्रकारसे बन्धयोग्य सभी प्रकृतियोंके अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा की गई है। इसी प्रकार स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्धके करनेवाले जीवोंके अल्पबहुत्वकी प्ररूपणा ओघ और आदेशसे विस्तारके साथ इस अनुयोगद्वारमें की भुजाकारबन्ध- आ. भूतबलिने चौवीस अनुयोगद्वारोंसे स्थितिबन्धकी प्ररूपणा करनेके पश्चात् भुजाकार, पदनिक्षेप और वृद्धि इन तीन अनुयोगद्वारोंसे भी स्थितिबन्धकी औरभी विशेष प्ररूपणा की है। पहले समयमें अल्प स्थितिका बन्ध करके अनन्तर समयमें अधिक स्थितिके बन्ध करनेको भुजाकार बन्ध कहते हैं। भुजाकार बन्धसेही अल्पतर, अवस्थित और अवक्तव्य बन्धोंका भी ग्रहण किया जाता है। पहले समयमें अधिक स्थितिका बन्ध करके दूसरे समयमें अल्पस्थितिके बन्ध करनेको अल्पतर बन्ध कहते हैं। पहले समयमे जितनी स्थितिका बन्ध किया, दूसरे समयमें उतनी ही स्थितिके बन्ध करनेको अवस्थित बन्ध कहते हैं। विवक्षित कर्मके बन्धका अभाव हो जाने पर पुनः उसके बन्ध करनेको अवक्तव्य बन्ध कहते हैं। इस भुजाकार बन्धका समुत्कीर्तना, स्वामित्व, काल, अन्तर, नाना जीवोंकी अपेक्षा भंगविचय, भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र, स्पर्शन, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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