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________________ छक्खंडागम मूल और उत्तर प्रकृतियोंके उत्कृष्ट-अनुत्कृष्टादि चारों प्रकारके बन्धोंके जघन्य और अजघन्य कालकी प्ररूपणा बहुत विस्तारसे की गई है । (२२) अन्तरप्ररूपणा- इस अनुयोगद्वारमें नानाजीवोंकी अपेक्षा पांच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, मिथ्यात्व, सोलह कषाय, भय, जुगुप्सा, आहारक द्विक, तैजस, कार्मणशरीर, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, आतप, उद्योत, निर्माण, तीर्थकर और पांच अन्तराय इतनी प्रकृतियोंके बन्धका अन्तर नहीं होता है। नरक, मनुष्य और देवायुके बन्धकोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर चौवीस मुहूर्त है। तिर्यगायुके बन्धकोंका अन्तर नहीं होता। शेष प्रकृतियोंके बन्धकोंका अन्तर नहीं होता हैं। स्थितिबन्धकी अपेक्षा आठों कर्मोकी उकृष्ट स्थितिको बन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी कालप्रमाण है । अनुत्कृष्ट स्थितिके बन्धक जीवोंका अन्तर नहीं होता । सात कर्मोकी जघन्य स्थितिके बन्धक जीवोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह मास है । अजघन्य स्थितिके बन्ध करनेवालोंका अन्तर नहीं होता। आयुकर्मकी जघन्य और अजघन्य स्थितिके बन्धक जीवोंका अन्तर नहीं होता । अनुभागबन्धकी अपेक्षा चार घातियाकर्म और आयुकर्मके उत्कृष्ट अनुभागके बन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण काल है। अनुत्कृष्ट अनुभागके बन्धक जीवोंका अन्तर नहीं होता है। वेदनीय, नाम और गोत्रकर्मके उत्कृष्ट अनुभागके बन्धक जीवोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह मास है । अनुत्कृष्ट अनुभागके बन्धक जीवोंका अन्तर नहीं होता है। चार घातिया कर्मोंके जघन्य अनुभागके बन्ध करनेवाले जीवोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल छह मास है। अजघन्य अनुभागके बन्धक जीवोंका अन्तर नहीं होता है । वेदनीय, आयु और नामकर्मके जघन्य और अजघन्य अनुभागके बन्धक जीवोंका अन्तरकाल नहीं है । गोत्रकर्मके जघन्य अनुभागके बन्धक जीवोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल असंख्यात लोकप्रमाण है। अजघन्य अनुभागके बन्धक जीवोंका अन्तर नहीं होता है । प्रदेशबन्धकी अपेक्षा आठों कर्मोके उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवालोंका जघन्य अन्तरकाल एक समय है और उत्कृष्ट अन्तरकाल जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण है। अनुत्कृष्ट प्रदेशबन्ध करनेवालोंका अन्तर नहीं होता। आठों ही कर्मोंके जघन्य और अजघन्य प्रदेशबन्ध करनेवाले जीवोंका भी अन्तर नहीं होता है इस प्रकारसे सभी उत्तर प्रकृतियोंके भी चारों प्रकारके बन्धोंका उत्कृष्ट-अनुत्कृष्ट आदि पदोंकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तरकालकी ग्ररूपणा ओघ और आदेशसे विस्तारके साथ इस अनुयोगद्वारमें की गई है। [२३] भावप्ररूपणा- इस अनुयोगद्वारमें चारों प्रकारके बन्ध करनेवाले जीवोंके भावोंका निरूपण किया गया है। जैसे प्रकृतिबन्धकी अपेक्षा आठों ही कर्मोका बन्ध करनेवाले Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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