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________________ सिद्धान्त-शब्द-परिभाषा [८३७ देशावधि- तद्भवमोक्षगामी साधुके परमावधि और सर्वावधि ज्ञानके सिवाय शेष चारों गतियोंके जीवोंके होनेवाले एकदेशरूप अवधिज्ञानको देशावधि कहते हैं। द्विस्थानिक बन्ध- लता और दारु रूप द्विस्थानिक अनुभागबन्धको द्विस्थानिक बन्ध कहते हैं। धरणी- धरणी अर्थात् पृथ्वी जैसे अपने ऊपर वृक्ष व पर्वत आदिको धारण करती है, उसी प्रकार जो बुद्धि अपने भीतर ज्ञात अर्थको दीर्घ काल तक धारण करे उसे धरणी कहते हैं । यह धारणाका दूसरा नाम है । धर्मकथा- श्रुतज्ञानके बारह अंगोंमेंसे किसी एक अंगके एक अधिकारके उपसंहारको धर्मकथा कहते हैं। धारणा- अवायसे जाने हुए पदार्थको चिरकाल तक धारण करनेकी अविस्मरणरूप योग्यताको धारणा कहते हैं। ध्रुवशन्यद्रव्यवर्गणा- सान्तर-निरन्तरद्रव्यवर्गणाओंके ऊपर और प्रत्येकशरीरद्रव्यवर्गणाओंके नीचे मध्यवर्ती ग्रहण करनेके अयोग्य ऐसी पुद्गलवर्गणाओंको ध्रुवशून्यद्रव्यवर्गणा कहते हैं। ध्रुवस्कन्धद्रव्यवर्गणा- कार्मणद्रव्यवर्गणाओंके ऊपर और सान्तर-निरन्तरद्रव्यवर्गणाओंके नीचे मध्यवर्ती ग्रहण करनेके अयोग्य ऐसी पुद्गलवर्गणाओंको ध्रवस्कन्धद्रव्यवर्गणा कहते हैं। नयवाद-ऐहिक और पारलौकिक फलकी प्राप्तिके उपायको नय कहते हैं। उसका वाद अर्थात् कथन जिस सिद्धान्तके द्वारा किया जाता है, ऐसे श्रुतज्ञानको नयवाद कहते हैं। नयविधि- नैगमादि नयोंके द्वारा जीवादि पदार्थों के स्वरूपका विधान करनेवाले आगमको नयविधि कहते हैं । नानाप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर- नाना गणहानियोंमें जो उत्तरोत्तर एक गुणहानिसे दूसरी गुणहानिका द्रव्य आधा आधा होता हुआ चला जाता है, उसे नानाप्रदेशगुणहानिस्थानान्तर कहते हैं । निगोद- जिन अनन्त जीवोंका आहार, श्वासोच्छवास, जीवन और मरण एक साथ होता है; ऐसे वनस्पति कायिक साधारणशरीरवाले जीवोंको निगोद कहते हैं। निरन्तरअपक्रमणकाल- अन्तर-रहित अपक्रमणकालको निरन्तरअपक्रमणकाल कहते हैं। निरन्तरउपक्रमणकाल- अन्तर-रहित जीवोंकी उत्पत्तिके कालको निरन्तरउपक्रमणकाल कहते हैं । निरन्तरसमय उपक्रमणकाल- प्रथम उपक्रमणकाण्डकके कालको निरन्तरसमयउपक्रमणकाल कहते हैं। निर्लेपनकाल- कर्म-निषेकोंके निर्जीव होनेके कालको निर्लेपनकाल कहते हैं। निवत्तिपर्याप्त- अपने योग्य पर्याप्तियोंके पूर्ण करनेवाले जीवको निवृत्तिपर्याप्त कहते हैं। निषेक - समागत कर्मवर्गणाओंमेंसे कर्मस्थितिके भीतर एक समयमें दिये जानेवाले द्रव्यको निषेक या कर्मनिषेक कहते हैं। नैगमनय-जो संग्रह और व्यवहार इन दोनों नयोंके विषयोंको ग्रहण करे, उसे नैगमनय कहते हैं। संकल्पके द्वारा अनिष्पन्न भी वस्तुका प्रतिपादन करनेवाले उपचार-प्रधान नयको नैगमनय कहते हैं। परम्पराबन्ध - बन्ध होनेके द्वितीय समयसे लेकर कर्मरूप पूदगलस्कन्धों और जीवप्रदेशोंके बन्धकी जो स्थिति पर्यन्त परम्परा बनी रहती है, उसे परम्पराबन्ध कहते हैं। परम्परोपनिधा - पूर्व गुणहानिके द्रव्यसे उत्तर गुणहानिका द्रव्य आधा होता है, इस प्रकार उत्तरोत्तर गुण हानियोंमें उनके हीयमान द्रव्यके विचार करनेको परम्परोपनिधा कहते हैं। परिवर्तना -- ग्रहण किये हुए अर्थका स्मरण रखनेके लिए उसका हृदयमें पुनः पुनः विचार करना, इसे परिवर्तना कहते हैं। परिवर्तमानमध्यमपरिणाम - जिन परिणामोंमें स्थित होकर परिणामान्तरको प्राप्त हो, पुनः एक दो आदि समयोंके द्वारा उन्हीं पूर्व परिणामोंमें आगमन सम्भव होता है, ऐसे मध्यमजातीय परिणामोंको परिवर्तमानमध्ममपरिणाम कहते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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