SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 908
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५, ६, ६५८ ] बंधणाणियोगद्दारे चूलिया [७८३ उसके ऊपर असंक्षेपाद्धा- जघन्य आयुबन्धकाल- है ॥ ६४५ ॥ असंक्षेपाद्धाके ऊपर क्षुद्रभवग्रहण है ॥ ६४६ ॥ क्षुद्रभवग्रहणके आगे जघन्य अपर्याप्त निवृत्ति है ॥ ६४७ ॥ जघन्य अपर्याप्त निर्वृत्तिके आगे अन्तर्मुहूर्त प्रमाण उत्कृष्ट अपर्याप्त निर्वृत्ति होती है ॥ ६४८ ॥ वही सूक्ष्मनिगोद जीवोंकी जघन्य अपर्याप्त निवृत्ति है ।। ६४९ ॥ उपरिमुक्कस्सिया अपज्जत्तणिव्यत्ती अंतोमुहुत्तिया ॥ ६५० ॥ जघन्य अपर्याप्त निर्वृत्तिसे उपरिम उत्कृष्ट अपर्याप्त निवृत्ति अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है ॥ तत्थ इमाणि पढमदाए आवासथाणि होति ॥ ६५१ ॥ वहां प्रथम समयमें लेकर सूक्ष्मनिगोद जीवोंकी उत्कृष्ट अपर्याप्त निवृत्ति तक ये आवश्यक होते हैं ॥ ६५१ ॥ तदो जवमझं गंतूण सुहुमणिगोदअपज्जत्तयाणं णिललेवणट्ठाणाणि आवलियाए असंखेज्जदिभागमेत्ताणि ॥ ६५२ ॥ तदनन्तर यवमध्यके व्यतीत होनेपर सूक्ष्म निगोद अपर्याप्तकोंके आवलिके असंख्यातवें भाग प्रमाण निर्लेपनस्थान होते हैं ॥ ६५२ ॥ तदो जवमझं गंतूण बादरणिगोदजीवअपज्जत्तयाणं णिल्लेवणट्ठाणाणि आवलियाए असंखेज्जदिभागमेत्ताणि ॥ ६५३ ॥ तत्पश्चात् यवमध्य जाकर बादर निगोद अपर्याप्त जीवोंके आवलिके असंख्यातवें भाग प्रमाण निर्लेपनस्थान होते हैं ॥ ६५३ ॥ तदो अंतोमुहुत्तं गंतूण सुहुमणिगोदजीवअपज्जत्तयाणमाउअबंधजवमझं ॥६५४॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म निगोद अपर्याप्त जीवोंका आयुबन्ध यवमध्य होता है । तदो अंतोमुहुत्तं गंतूण बादरणिगोदजीवअपज्जत्तयाणमाउअबंधजवमज्झं ॥६५५॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर बादर निगोद अपर्याप्त जीवोंका आयुबन्धयवमध्य होता है । तदो अंतोमुहुत्तं गंतूण सुहुमणिगोदजीवअपज्जत्तयाणं मरणजवमझं ॥ ६५६ ॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म निगोद अपर्याप्त जीवोंका मरणयवमध्य होता है । तदो अंतोमुहुत्तं गंतूण बादरणिगोदजीवअपज्जत्तयाणं मरणजवमझं ॥६५७॥ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर बादर निगोद अपर्याप्त जीवोंका मरणयवमध्य होता है ॥ तदो अंतोमुहुत्तं गंतूण सुहुमणिगोदजीवअपज्जत्तयाणं णिव्वत्तिट्ठाणाणि आवलियाए असंखेज्जदिभागमेत्ताणि ॥ ६५८ ॥ ___ तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म निगोद अपर्याप्तकोंके आवलिके असंख्यातवें भाग प्रमाण निवृत्तिस्थान होते हैं ॥ ६५८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy