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________________ ७८२ ] छक्खंडागमे वग्गणा - खंड एदेसिं चैव सव्वणिगोदाणं मूलमहाखंघट्टाणाणि ।। ६३९ ॥ इन सभी निगोदोंका - बादर निगोदोंका - मूल (कारण) महास्कन्धस्थान हैं ॥ ६३९ ॥ पुढीओ टंकाणि कूडाणि भवणाणि विमाणाणि विमादियाणि विमाणपत्थडाणि णिरयाणि णिरईदयाणि णिरयपत्थडाणि गच्छाणि गुम्माणि वल्लीणि लदाणि तणवणफदिआदीणि ।। ६४० ॥ उपर्युक्त महास्कन्धस्थान ये हैं- आठ पृथिवीयां, टंक ( पर्वतोंपर खोदी गई वापिकायें, कुटं, तालाब और जिनभवन आदि), कूट ( मेरू और कुलाचल आदि), भवन, विमान, ऋतु आदि विमानेन्द्रक, विमानस्तर, नरक, नारकेन्द्रक, नारकप्रस्तर, गच्छ, गुल्म, बल्ली, लता और तृण वनस्पति आदि || ६४० ॥ जदा मूलमहाखंधट्टाणाणं जहण्णपदे तदा बादरतसपज्जाणं उक्कसप || जब मूल महास्कन्धस्थानोंका जघन्य पद होता है तब बादर त्रस पर्याप्तकोंका उत्कृष्ट पद होता है || ६४१ ॥ [ ५, ६, ६३९ जदा बादरतसपज्जत्ताणं जहण्णपदे तदा मूलमहावखंवाणाणमुक्कस्सपदे || जब बादर त्रस पर्याप्तोंका जघन्य पद होता है तब मूलमहास्कन्धस्थानोंका उत्कृष्ट पद होता है ॥ ६४२ ॥ ६. महादंडओ तो सव्वजीवेसु महादंडओ कायव्वो भवदि || ६४३ ॥ अब आगे सब जीवोंमें महादण्डक किया जाता है ॥ ६४३ ॥ Jain Education International सव्वत्थोवं खुदाभवग्गहणं । तं तिधा विहत्तं - हेट्ठिल्लए तिभाए सव्वजीवाणं जहणिया अपज्जत्तणिव्वत्ती, मज्झिल्लए तिभाए णत्थि आवासयाणि, उवरिल्लए तिभागे आउ अबंधो जवमज्झं समिलामज्झे ति बुच्चदि । ६४४ ॥ क्षुद्रकभवग्रहण सबसे स्तोक है- वह तीन प्रकारका है- अधस्तन त्रिभाग में सब जीवों की जघन्य अपर्याप्तनिर्वृत्ति होती है, मध्यम त्रिभागमें आवश्यक नहीं होते, और उपरिम त्रिभागा में आयुबन्ध यवमध्य होता है । उसे शमिलायवमध्य कहा जाता है ॥ ६४४ ॥ तस्सुवरिमसंखेपद्धा ।। ६४५ ।। असंखेपद्धस्सुवरि खुद्दाभवग्गहणं ॥ ६४६ ॥ खुद्दाभवग्गहणस्सुवरि जहणिया अपज्जत णिव्वत्ती ॥। ६४७ ।। जहण्णियाए अपज्जतणिव्वत्ती उवरिमुक्कस्सिया अपज्जत्तणिव्वत्ती अंतोमुहुत्तिया । ६४८ ॥ तं चैव सुहुमणिगोदजीवाणं जहणिया अपज्जतणिव्वती ॥ ६४९ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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