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________________ ५, ३, २२०] बंधणाणियोगद्दारे सरीरिसरीरपरूवणाए अप्पाबहुअपरूवणा [७४७ अवगदवेद-अकसाईणं णत्थि अप्पाबहुगं ॥ २०८ ॥ अपगतवेदी और अकषायी जीवोंमें एक ही पदके सम्भव होनेसे अल्पबहुत्त्व नहीं है । णाणाणुवादेण मदिअण्णाणि-सुदअण्णाणी ओघं ॥ २०९ ॥ ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुतज्ञानी जीवोंकी प्ररूपणा ओधके समान है ॥ विहंगणाणीसु सव्वत्थोवा चदुसरीरा ॥२१०॥ तिसरीरा असंखेज्जगुणा ॥२१॥ विभंगज्ञानी जीवोंमें चार शरीरवाले जीव सबसे स्तोक है ।। २१० ॥ उनसे तीन शरीरवाले असंख्यातगुणे ॥ २११ ॥ आभिणि-सुद-ओहिणाणीसु पंचिंदियपज्जत्ताणं भंगो ॥ २१२ ॥ आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंकी प्ररूपणा पंचेन्द्रिय पर्याप्तकोंके समान है ॥ २१२ ॥ मणपज्जवणाणीसु सव्वत्थोवा चदुसरीरा ॥ २१३ ॥ तिसरीरा संखेज्जगुणा ॥ मन:पर्ययज्ञानीयोंमें चार शरीरवाले जीव सबसे स्तोक हैं ॥ २१३ ॥ उनसे तीन शरीरवाले, जीव संख्यातगुणे हैं ॥ २१४ ॥ केवलणाणीसु णस्थि अप्पाबहुगं ॥ २१५ ॥ केवलज्ञानियोंमें एक ही पदके रहनेसे अल्पबहुत्त्व नहीं है ॥ २१५ ॥ संजमाणुवादेण संजदा सामाइय-च्छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदा मणपज्जवणाणि भंगो॥ संयममार्गणाके अनुवादसे संयत, सामायिकशुद्धिसंयत, और छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयत जीवोंकी प्ररूपणा मनःपर्ययज्ञानियोंके समान है ॥ २१६ ॥ परिहारसुद्धिसंजद-सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजद-जहाक्खादविहारसुद्धिसंजदाणं णत्थि अप्पाबहुगं ॥ २१७ ॥ परिहारशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत और यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत जीवोंमें अल्पबहुत्व सम्भव नहीं है ॥ २१७ ॥ संजदांसंजदा विभंगणाणिभंगो ॥ २१८ ॥ संयतासंयतोंकी प्ररूपणा विभंगज्ञानियोंके समान है ॥ २१८ ॥ असंजद-अचक्खुदंसणी ओघं ॥ २१९ ॥ असंयत और अचक्षुदर्शनी जीवोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २१९ ॥ लेस्साणुवादेण किण्ण - णील - काउलेस्सिया भवियाणुवादेण भवसिद्धिय - अभवसिद्धिया ओघं ॥ २२० ॥ लेश्यामार्गणाके अनुवादसे कृष्णलेश्यावाले, नीललेश्यावाले और कापोतलेश्यावाले तथा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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