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________________ ७४८] छक्खंडागमे वग्गणा-खंडं [५, ३, २२१ भव्यमार्गणाके अनुवादसे भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक जीवोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ दसणाणुवादेण चक्खुदंसणी ओहिंदंसणी तेउलेस्सिया पम्मलेसिया पंचिंदियपज्जत्ताणं भंगो ॥ २२१ ॥ दर्शनमार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनी और अवधिदर्शनी तथा लेश्याकी अपेक्षा पीतलेश्यावाले और पद्मलेश्यावाले जीवोंकी प्ररूपणा पंचेन्द्रिय पर्याप्तकोंके समान है ॥ २२१ ॥ केवलदसणीणं णत्थि अप्पाबहुगं ॥ २२२ ॥ केवलदर्शनियोंमें अल्पबहुत्त्व सम्भव नहीं है ॥ २२२ ॥ सुकलेस्सिया सव्वत्थोवा विसरीरा ॥२२३॥ चदुसरीरा असंखेज्जगुणा ॥२२४॥ तिसरीरा असंखेज्जगुणा ॥ २२५ ॥ शुक्ललेश्यावालोंमें दो शरीरवाले सबसे स्तोक हैं ॥ २२३ ॥ उनसे चार शरीरवाले असंख्यातगुणे हैं ॥ २२४ ॥ उनसे तीन शरीरवाले असंख्यातगुणे हैं ॥ २२५ ॥ सम्मत्ताणुवादेण सम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी सासणसम्माइट्ठी पंचिंदियपज्जत्तभंगो॥ सम्यक्त्वमार्गणाके अनुवादसे सम्यग्दृष्टि, वेदसम्यग्दृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंकी प्ररूपणा पंचेन्द्रिय पर्याप्तकोंके समान है ॥ २२६ ॥ खइयसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी सव्वत्थोवा विसरीरा ॥ २२७॥ चदुसरीरा असंखेज्जगुणा ॥ २२८ ॥ तिसरीरा असंखेज्जगुणा ॥ २२९ ॥ क्षायिकसम्यग्दृष्टि और उपशमसम्यग्दृष्टि जीवोंमें दो शरीरवाले सबसे स्तोक हैं ॥२२७॥ उनसे चार शरीरवाले असंख्यातगुणे हैं ॥२२८ ॥ उनसे तीन शरीरवाले असंख्यातगुणे हैं ॥२२९॥ सम्मामिच्छाइट्ठी संजदासंजदाणं भंगो ।। २३० ॥ सम्यग्मिध्यादृष्टियोंकी प्ररूपणा संयतासंयतोंके समान है ॥ २३० ॥ मिच्छाइट्ठी ओधं ॥ २३१ ॥ मिथ्यादृष्टियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २३१ ॥ सण्णियाणुवादेण सण्णी पंचिंदियपज्जत्ताणं भंगो ॥ २३२ ॥ संज्ञीमार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंकी प्ररूपणा पंचेन्द्रिय पर्याप्तकोंके समान है ॥२३२॥ असण्णी ओधं ॥ २३३ ॥ असंज्ञियोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २३३ ॥ आहाराणुवादेण आहारएसु ओरालियकायजोगिभंगो ॥ २३४ ॥ आहारमार्गणाके अनुवादसे आहारक जीवोंकी प्ररूपणा औदारिककाययोगियोंके समान है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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