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________________ ५, ३, १४६ ] बंधणाणियोगद्दारे सरीरिसरीरपरूवणाएसंतपरूवणा [७४१ बादरएइंदियअपज्जत्ता सुहुमेइंदिया तेसिं पज्जत्ता अपज्जत्ता बीइंदिया तीइंदिया चउरिंदिया तस्सेव पज्जत्ता अपज्जत्ता पंचिंदियअपज्जत्ता गेरइयभंगो । १४१ ॥ ___ बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय और उनके पर्याप्त व अपर्याप्त तथा द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय एवं इन तीनोंके पर्याप्त व अपर्याप्त और पंञ्चेन्द्रिय अपर्याप्त जीवोंकी प्ररूपणा नारकियोंके समान है ॥ १४१ ॥ कायाणुवादेण पुढविकाइया आउकाइया वणप्फदिकाइया णिगोदजीवा तेसिं बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरा तेसिं पज्जत्ता अपज्जत्ता बादरतेउक्काइयअपज्जत्ता बादरवाउक्काइयअपज्जत्ता सुहुमतेउकाइय-सुहुमवाउकाइयपज्जत्ता अपज्जत्ता तसकाइयअपज्जत्ता अस्थि जीवा विसरीरा तिसरीरा ॥ १४२ ॥ कायमार्गणाके अनुवादसे पृथीवीकायिक, जलकायिक, वनस्पतिकायिक, निगोद जीव; उनके बादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त, बादर वनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीर व उनके पर्याप्त और अपर्याप्त, बादर अग्निकायिक अपर्याप्त, बादर वायुकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म अग्निकायिक और सूक्ष्म वायुकायिक तथा इनके पर्याप्त और अपर्याप्त, एवं त्रसकायिक अपर्याप्त जीव दो शरीरवाले और तीन शरीरवाले होते हैं ॥ १४२ ॥ तेउफ्काइया वाउक्काइया बादरतेउक्काइया बादरवाउक्काइया तेसिं पज्जत्ता तसकाइया तसकाइयपज्जत्ता ओघं ॥१४३ ॥ अग्निकायिक, वायुकायिक, बादर अग्निकायिक, बादर वायुकायिक और उनके पर्याप्त, त्रसकायिक और त्रसकायिक पर्याप्त जीवोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १४३ ॥ जोगाणुवादेण पचमणजोगी पंचवचिजोगी ओरालियकायजोगी अस्थि जीवा तिसरीरा चदुसरीरा ॥ १४४ ॥ __ योगमार्गणाके अनुवादसे पांचों मनोयोगी, वचनयोगी पांचों और औदारिककाययोगी जीव तीन शरीरवाले और चार शरीरवाले होते हैं । १४४ ॥ ___ विग्रहगतिमें चूंकि उक्त ग्यारह योगवाले जीवोंके अस्तित्वकी सम्भावना नहीं है, अत एव उनके दो शरीर नहीं पाये जाते है; यह यहां विशेष जानना चाहिये । कायजोगी ओघं ॥ १४५ ॥ काययोगी जीवोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ १४५ ॥ ओरालियमिस्सकायजोगि-वेउब्वियकायजोगि-वेउनियमिस्सकायजोगीसु अत्थि जीवा तिसरीरा ॥ १४६ ॥ __ औदारिकमिश्रकाययोगी, वैक्रियिककाययोगी और वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें विग्रहगतिकी सम्भावना न होनेसे उनमें तीन शरीरवाले ही जीव होते हैं- दो शरीरवाले नहीं होते ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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