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________________ ५, ५, १५८] पयडिअणियोगद्दारे अंतराइयपयडिपरूवणा [ ७१७ गोत्रकर्मकी कितनी प्रकृतियां होती हैं ? ॥ १५१ ॥ गोत्रकर्मकी दो प्रकृतियां हैं-- उच्चगोत्र और नीचगोत्र । उसकी इतनी मात्र प्रकृतियां हैं ॥ १५२ ॥ ___अंतराइयस्स कम्मस्स केवडियाओ पयडीओ ? ॥ १५३ ॥ अंतराइयस्स कम्मस्स पंचपयडीओ- दाणंतराइयं लाहंतराइयं भोगतराइयं परिभोगतराइयं विरियंतराइयं चेदि । एवडियाओ पयडीओ ॥ १५४ ॥ अन्तरायकर्मकी कितनी प्रकृतियां है ? ॥ १५३ ॥ अन्तरायकर्मकी पांच प्रकृतियां हैंदानान्तराय; लाभान्तराय, भोगान्तराय, परिभोगान्तराय, और वीर्यान्तराय । उसकी इतनी मात्र प्रकृतियां हैं ॥ १५४ ॥ जा सा भावपयडी णाम सा दुविहा- आगमदो भावपयडी चेव णोआगमदो भावपयडी चेव ॥१५५ ॥ जो वह भावप्रकृति है वह दो प्रकारकी है- आगमभावप्रकृति और नोआगमभावप्रकृति ॥ जा सा आगमदो भावपयडी णाम तिस्से इमो णिदेसो ठिदं जिदं परिजिदं वायणोवगदं सुत्तसमं अस्थसमं गंथसमं णामसमं घोससमं । जा तत्थ वायणा वा पुच्छणा वा पडिच्छणा वा परियट्टणा वा अणुपेहणा वा थय-थदि-धम्मकहा वा जे चामण्णे एवमादिया उवजोग । भावे त्ति कट्ट जावदिया उवजुत्ता भावा सा-सव्वा आगमदो भावपयडी णाम ॥ १५६ ॥ उनमें जो वह आगमभावकृति है उसका यह निर्देश है- स्थित, जित, परिजित, वाचनोपगत, सूत्रसम, अर्थसम, ग्रन्थसम, नामसम और घोषसम । तथा इनमें जो वाचना, पृच्छना, प्रतीच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षणा और स्तव, स्तुति व धर्मकथा तथा इनको आदि लेकर और जो उपयोग हैं 'वे सब भाव है' ऐसा समझकर जितने उपयुक्त भाव हैं वह सब आगमभावकृति है ॥ ___जा सा णोआगमदो भावपयडी णाम सा अणेयविहा । तं जहा-सुर-असुर-णागसुघण्ण-किण्णर-किंपुरिस-गरुड-गंधव्य - जक्ख-रक्खस - मणुअ-महोरग-मिय - पसु-पक्खि-दुवयचउप्पय-जलचर-थलचर-खगचर-देव-मणुस्स-तिरिक्ख -णेरइयणियणुगा पयडी सा सव्वा णोआगमदो भावपयडी णाम ॥१५७ ॥ __ जो वह नोआगमभावप्रकृति है वह अनेक प्रकारकी है । यथा-सुर, असुर, नाग, सुपर्ण, किन्नर, किंपुरुष, गरूड, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, मनुज, महोरग, मृग, पशु, पक्षी, द्विपद, चतुष्पद, जलचर, स्थलचर, खगचर, देव, मनुष्य, तिर्यंच और नारकी; इन जीवोंकी जो अपनी अपनी प्रकृति है वह सब नोआगमभावप्रकृति है ॥ १५७ ॥ एदासिं पयडीणं काए पयडीए पयदं ? कम्मपयडीए पयदं ॥ १५८ ॥ इन प्रकृतियोंमें किस प्रकृतिका प्रकरण है ? कर्म प्रकृतिका प्रकरण है ॥ १५८ ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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