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पयडिणिओगद्दारे केवलणाणपरूवणा
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केवलज्ञानावरणीय कर्मकी कितनी प्रकृतियां है ? ॥ ९५ ॥ केवलज्ञानावरणीयकी एक ही प्रकृति है ||९६|| वह केवलज्ञान सकल अखण्ड है, सम्पूर्ण है, और असपत्न विपक्षसे रहित है ॥ सईं भयवं उप्पण्णणाणदरिसी सदेवासुर- माणुसस्स लोगस्स आगदि गर्दि चयणोववादं बंध मोक्खं इडिंट डिदि जुदिं अणुभागं तक्कं कलं माणो माणसियं भुक्तं कदं पडिसेविदं आदिकम्मं अरहकम्मं सव्वलोए सव्वजीवे सव्वभावे सम्मंसमं जाणदि पस्सदि विहरदिति । ९८ ।। केवलणाणं ।। ९९ ।
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स्वयं उत्पन्न हुए ज्ञानसे देखनेवाले भगवान् केवली देवलोक, असुरलोक और मनुष्यलोककी आगति, गति, चयन, उपपाद, बन्ध, मोक्ष, ऋद्धि, स्थिति, युति, ( द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा जीवादि द्रव्योंका संयोग ) अनुभाग, तर्क, कला, मन, मानसिक ( मनसे चिन्तित अर्थ) भुक्त, कृत, प्रतिसेवित, आदिकर्म, ( द्रव्योंकी सादिता ) अरह: कर्म, (अनादिता,) सब लोकों, सब जीवों और सब भावोंको सम्यक् प्रकारसे युगपत् जानते हैं, देखते हैं, और विहार करते हैं ॥ ९८ ॥ ऐसा वह केवलज्ञान है ॥ ९९ ॥
सणावरणीय कम्मस्स केवडियाओ पयडीओ १ ।। १०० ।। दंसणावरणीयस्स कम्मस्स णव पयडीओ - णिद्दाणिद्दा पयलापयला थीणगिद्धी णिद्दा य पयला य चक्खु दंसणावरणीयं अचक्खुदंसणावरणीयं ओहिंदंसणावरणीयं केवलदंसणावरणीयं चेदि ॥ १०१ ॥ एवडियाओ पयडीओ ।। १०२ ।।
दर्शनावरणीय कर्मकी कितनी प्रकृतियां हैं ? ॥ १०० ॥ दर्शनावरणीय कर्मकी नौ प्रकृतियां हैं- निद्रानिद्रा प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, निद्रा, प्रचला, चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और केवलदर्शनावरणीय ॥ १०१ ॥ उसकी इतनी प्रकृतियां हैं ॥ aritra कम्मस्स केवडियाओ पयडीओ १ ।। १०३ ।। वेयणीयस्स कम्मस्स दुवे पडीओ - सादावेदणीयं चेव असादावेदणीयं चेव । एवडियाओ पयडीओ ॥ १०४ ॥ वेदनीय कर्मकी कितनी प्रकृतियां होती हैं ? ॥ १०३ ॥ वेदनीय कर्मकी दो प्रकृतियां हैं- सातावेदनीय और असातावेदनीय उसकी इतनी ही प्रकृतियां होती हैं ॥ १०४ ॥
मोहणीयस्स कम्मस्स केवडियाओ पयडीओ १ ।। १०५ ।। मोहणीयस्स कम्मस्स अट्ठावीस पयडीओ ॥ १०६ ॥ तं च मोहणीयं दुविहं दंसणमोहणीयं चेव चरितमोहणीयं चेव ।। १०७ ॥
मोहनीय कर्मकी कितनी प्रकृतियां है ? ॥ १०५ ॥ मोहनीय कर्मकी अट्ठाईस प्रकृतियां है ॥ १०६ ॥ वह मोहनीय कर्म दो प्रकारका है- दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीय ॥ १०७ ॥ जं तं दंसणमोहणीयं कम्मं तं बंधदो एयविहं ।। १०८ ।। तस्स संतकम्मं पुण तिविहं - सम्मत्तं मिच्छत्तं सम्मामिच्छत्तं ॥ १०९ ॥
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