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________________ छक्खंडागमे वग्गणा - खंड [ ५, ५, १०९ जो वह दर्शनमोहनीय कर्म है वह बन्धकी अपेक्षा एक प्रकारका है ॥ १०८ ॥ किन्तु उसका सत्कर्म तीन प्रकारका है- सम्यक्त्व, मित्थात्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व ॥ १०९ ॥ ७१२ ] जं तं चरित्त मोहणीयं कम्मं तं दुविहं- कसाय वेदणीयं णोकसायवेयणीयं चेव ॥ ११० ॥ जं तं कसायवेयणीयं कम्मं तं सोलसविहं- अनंताणुबंधि कोह -माण - माया - लोहं अपचक्खाणावरणीय कोह- माण - माया-लोहं, पच्चक्खाणावरणीय कोह- माण- माया-लोहं, कोहसंजलणं, माणसंजलणं, मायासंजलणं, लोभसंजलणं चेदि ॥ १११ ॥ जो वह चारित्रमोहनीय कर्म है वह दो प्रकारका है- कषायवेदनीय और नोकप्रायवेदनीय ॥ ११० ॥ जो कषायवेदनीय कर्म है वह सोलह प्रकारका है- अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ; अप्रत्यख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया और लोभ, प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया और लोभ; क्रोधसंज्वलन, मानसंज्वलन, मायासंज्वलन और लोभसंज्वलन ॥ १११ ॥ जं तं णोकसायवेयणीयं कम्मं तं णव विहं - इत्थिवेद पुरिसवेद-उंसयवेद-हस्सरदि- अरदि-सोग-भय-दुर्गुच्छा चेदि ॥ ११२ ॥ एवडियाओ पयडीओ ॥ ११३ ॥ जो नोकषायवेदनीय कर्म है वह नौ प्रकारका है - स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुसंकवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा ॥ ११२ ॥ नोकषायवेदनीयकी इतनी प्रकृतियां है ॥ ११३ ॥ आउ कम्मस्स केवडियाओ पयडीओ ? ।। ११४ ।। आउअस्स कम्मस्स चत्तारि पयडिओ - णिरयाउअं तिरिक्खाउअं मणुस्साउअं देवाउअं चेदि । एवडियाओ पयडीओ ।। ११५ ॥ आयुकर्मकी कितनी प्रकृतियां है ? ॥ ११४ ॥ आयुकर्मकी चार प्रकृतियां है---- नारकायु, तिथं चायु, मनुष्यायु और देवायु । उसकी इतनी प्रकृतियां होती हैं ॥ ११५ ॥ णामस्स कम्मस्स केवडियाओ पयडीओ ? ।। ११६ ।। णामस्स कम्मस्स बादालीसं पिंडपयडिणामाणि - गदिणामं जादिणामं सरीरणामं सरीरबंधणणामं सरीरसंघादणामं सरीरसंठाणणामं सरीर अंगो वंगणामं सरीरसंघडणणामं वण्णणामं गंधणानं रसणामं फासणाम आणुपुव्विणामं अगुरुगलहुअणामं उवघादणामं परघादणामं उस्सासणामं आदावणामं उज्जोवणामं विहायगदि तस थावर बादर - सुहुम पज्जत - अपज्जत पत्तेय - साहारणसरीर थिराथिर सुहासु सुभग- दुभग सुस्सर- दुस्सर, आदेज्ज- अणादेज्ज जसकित्ति - अजसकित्ति णिमिण तित्थयरणामं चेदिं ॥ ११७ ॥ नामकर्मकी कितनी प्रकृतियां हैं ? ॥ ११६ ॥ नामकर्मकी ब्यालीस पिण्डप्रकृतियां हैंगतिनामकर्म, जातिनामकर्म, शरीरनामकर्म, शरीरबन्धननामकर्म, शरीरसंघातनामकर्म, शरीर संस्थाननामकर्म, शरीरांगोपांगनामकर्म, शरीरसंहनननामकर्म, वर्णनामकर्म, गन्धनामकर्म, रसनामकर्म, स्पर्शनामकर्म, आनुपूर्वीनामकर्म, अगुरुलघुनामकर्म, उपघातनामकर्म, परघातनामकर्म, उच्छवासनामकर्म, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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