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________________ ७०८] छक्खंडागमे वग्गणा-खंड [५, ५, ७९ जो वह ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञानावरणीय कर्म है वह तीन प्रकारका है उसके द्वारा आत्रियमाण ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञान ऋजुमनोगत अर्थको जानता है, ऋजुवचनगत अर्थको जानता हैं और ऋजुकायगत अर्थको जानता है ।। ७८ ॥ यथार्य मन, वचन और कायके व्यापारका नाम ऋजु तथा संशय, विपर्यय व अनध्यवसायरूप मन, वचन एवं कायके व्यापारका नाम अनृजु है। इनमें अचिन्तन अथवा अर्ध चिन्तनको अनध्यवसाय, अस्थिर प्रत्ययको संशय और अयथार्थ चिन्तनको विपर्यय कहा जाता है । यह ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञान जो ऋजुस्वरूपसे मनको प्राप्त अर्थ उसको ही जानता है, अनृजु मनोगत अर्थको अचिन्तित, अर्धचिन्तित अथवा विपरीत स्वरूपसे चिन्तित अर्थको- नहीं जानता है। , इस प्रकार ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञान चूंकि तीन प्रकारका है अत एव उसका आवारक ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञानावरण भी तीन प्रकारका है, यह अभिप्राय समझना चाहिये । मणेण माणसं पडिविंदइत्ता परेसिं सण्णा सदि मदि चिंता जीविव-मरणं लाहालाह सुह-दुक्खं णयरविणासं देसविणासं जणवयविणासं खेडविणासं कव्वडविणासं मंडबविणासं पट्टणविणासं दोणामुहविणासं अइबुट्टि अणावुट्टि सुवुट्टि दुवुट्टि सुभिक्खं दुभिक्खं खेमाखेमभय-रोग कालसंजुत्ते अत्थे वि जाणदि ॥ ७९ ॥ __मनके द्वारा मानसको जानकर मनःपर्यायज्ञान कालसे विशेषित दूसरोंकी संज्ञा, स्मृति, मति, चिन्ता, जीवित-मरण, लाभ-अलाभ, सुखदुःख, नगरविनाश, देशविनाश, जनपदविनाश, खेट विनाश, कर्वटविनाश, मटम्बविनाश, पट्टनविनाश, द्रोणमुखविनाश, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सुवृष्टि, दुवृष्टि, सुभिक्ष, दुर्भिक्ष, क्षेत्र-अक्षेत्र, भय और रोग रूप पदार्थों को भी जानता है ।। ७९ ॥ मन शब्दसे यहां कार्यमें कारणका उपचार करके मतिज्ञानका ग्रहण किया गया है । अभिप्राय यह कि ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञानी जीव मतिज्ञानसे दूसरोंके मनको ग्रहण करके मनःपर्ययज्ञानके द्वारा उस मनमें स्थित संज्ञा व स्मृति आदिको जानता है। किचिंभूओ-अप्पणो परेसिं च वत्तमाणाणं जीवाणं जाणदि णो अवत्तमाणाणं जीवाणं जाणदि ॥ ८० ॥ उक्त ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञानके विषयभूत पदार्थकी प्ररूपणा फिरसे भी कुछ की जाती है- व्यक्तमनवाले अपने और दूसरे जीवोंसे सम्बन्ध रखनेवाले अर्थको जानता है, अव्यक्त मनवाले जीवोंसे सम्बन्ध रखनेवाले अर्थको नहीं जानता ॥ ८० ॥ व्यक्त' का अर्थ यहां संशय, विपर्यय व अनध्यवसायसे रहित तथा 'मन' का अर्थ कार्यमें कारणका उपचार करनेसे चिन्ता अभीष्ट है। अत एव अभिप्राय यह हुआ कि जिनका चिन्तन संशयादिसे रहित सरल है ऐसे स्वयं और दूसरे जीवों सम्बन्धी वस्त्वन्तरको वह ऋजुमतिमन:पर्यय जानता है; किन्तु अव्यक्त मनवाले जीवोंके मनोगत वस्तुको नहीं जानता है। यहां Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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