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________________ ५, ५, १८] पयडिअणिओगद्दारे ठवणपयडिपरूवणा [६९७ जा सा ढवणपयडी णाम सा कट्ठकम्मेसु वा चित्तकम्मेसु वा पोत्तकम्मसु वा लेप्पकम्मेसु वा लेणकम्मेसु वा सेलकम्मेसु वा गिहकम्मेसु वा भित्तिकम्मेसु वा दंतकम्मेसु वा भेंडकम्मेसु वा अक्खो वा वराडओ वा जे चामण्णे दुवणाए हविजंति पगदि त्ति सा सव्वा दुवणपयडी णाम ॥ १० ॥ जो वह स्थापनाप्रकृति है उसका स्वरूप इस प्रकार है- काष्टकर्मोंमें चित्रकर्मोमें, पोत्तकोंमें, लेप्यकर्मोमें, लयनकर्मों में, शैलकर्मोंमें, गृहकर्मोमें, भित्तिकौमें, दन्तकोंमें, भेण्डकर्मों में तथा अक्ष या वराटक एवं इनको आदि लेकर अन्य जो भी हैं उनमें जो ‘यह प्रकृति है' इस प्रकार अभेदरूपसे स्थापना की जाती है वह सब स्थापना प्रकृति है ॥ १० ॥ जा सा दव्यपयडी णाम सा दुविहा- आगमदो दब्बपयडी चेव णोआगमदो दवपयडी चेव ॥११॥ जा सा आगमदो दव्वपयडी णाम तिस्से इमे अत्थाधियारा-द्विदं जिदं परिजिदं वायणोवगदं सुत्तसमं अत्थसमं गंथसमं णामसमं घोससमं ॥ १२ ॥ द्रव्यप्रकृति दो प्रकारकी होती है- आगमद्रव्यप्रकृति और नोआगमद्रव्यप्रकृति ॥ ११ ॥ इनमें जो आगमद्रव्यप्रकृति है उसके ये अर्थाधिकार हैं- रिथत, जित, परिजित, वाचनोपगत, सूत्रसम, अर्थसम, ग्रन्थसम, नामसम और घोषसम ॥ १२ ॥ जा तत्थ वायणा वा पुच्छणा वा पडिच्छणा वा परियट्टणा वा अणुपेहणा वा थय - थुइ - धम्मकहा वा, जे चामण्णे एवमादिया ॥ १३ ॥ अणुवजोगा दव्वे नि कट्ट जावदिया अणुवजुत्ता दव्वा सा सव्वा आगमदो दव्वपयडी णाम ॥ १४ ॥ उक्त नौ आगमों विषयक जो वाचना, पृच्छना, प्रतीच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षणा, स्तव, स्तुति और धर्मकथा तथा इनको आदि लेकर और भी हैं वे सब प्रकृतिविषयक उपयोग हैं ॥ १३ ॥ जो जीव प्रकृतिप्राभृतको जानते हुए भी वर्तमानमें तद्विषयक उपयोगसे रहित हैं वे सब द्रव्य हैं, ऐसा समझकर जितने वे अनुपयुक्त द्रव्य हैं वे सब आगमद्रव्य प्रकृति कहे जाते हैं ॥१४॥ जा सा णोआगमदो दव्बपयडी णाम सा दुविहा- कम्मपयडी चेव णोकम्मपयडी चेव ॥ १५ ॥ जा सा कम्मपयडी णाम सा थप्पा ॥ १६ ॥ नोआगमद्रव्यप्रकृति दो प्रकारकी है- कर्मप्रकृति और नोकर्मप्रकृति ॥ १५ ॥ उनमें जो कर्मप्रकृति है उसे इस समय स्थगित किया जाता है ॥ १६ ॥ जा सा णोकम्मपयडी णाम सा अणेयविहा ॥ १७ ॥ घड-पिढर-सरावारंजणोलुचणादीणं विविहभायणविसेसाणं मट्टिया पयडी, घाणतप्पणादीणं च जव-गोधूमा पयडी सा सव्वा णोकम्मपयडी णाम ॥ १८ ॥ दूसरे भेदरूप जो नोकर्मद्रव्य प्रकृति है वह अनेक प्रकारकी है ॥ १७ ॥ घट, छ.८८ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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