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________________ ५, ४, ३१] कम्माणिओगद्दारे तवोकम्मप्ररूवणा [६९५ जंतं तवोकम्मं णाम ॥ २५ ॥ तं सब्भंतरबाहिरं बारसविहं तं सव्वं तवोकम्म णाम ॥२६॥ .. अब तपःकर्मका अधिकार है ॥ २५ ॥ वह आभ्यन्तर और बाह्यके भेदसे बारह प्रकारका है । वह सब तपःकर्म है ॥ २६ ॥ जं तं किरियाकम्मं णाम ॥ २७ ॥ तमादाहीणं पदाहीणं तिक्खुत्तं तियोणदं चदुसिरं बारसावतं तं सव्वं किरियाकम्मं णाम ॥२८॥ अब क्रियाकर्मका अधिकार है ॥ २७ ॥ आत्माधीन होना, प्रदक्षिणा करना, तीन वार करना, तीन वार अवनति, चार वार सिर नवाना और बारह आवर्त, यह सब क्रियाकर्म है ॥२८॥ __यह क्रियास्वरूप कर्म आत्माधीन, पदाहिन, तिक्खुत्त, तियोणद, चतुःशिर और द्वादशावर्तके भेदसे छह प्रकारका है। उनमें परवशतासे रहित होकर जो केवल आत्मसापेक्ष क्रिया की जाती है उसका नाम आत्माधीन कियाकर्म है। वंदनाके समय गुरु, जिनदेव व जिनालयको प्रदक्षिणापूर्वक जो नमस्कार किया जाता है वह पदाहिण (प्रदक्षिण ) क्रियाकर्म कहा जाता है । एकही दिनमें संध्या कालोंमें उक्त प्रदक्षिणा एवं नमस्कार आदिके तीन वार करनेका नाम तिक्खुत्त क्रियाधर्म है । उक्त वंदना आदि केवल तीन संध्याकालोंमें ही किये जाते हों, ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि, अन्य समयमें उनका निषेध नहीं है, परन्तु उन संध्याकालोंमें वे नियमसे करने योग्य हैं; यह अभिप्राय ग्रहण करना चाहिये । ओणदका अर्थ अवनमन या भूमिमें स्थित होना है। वह तीन वार किया जाता है- १. जिनदर्शन करके हर्षपूर्वक जिन भगवान्के आगे बैठना, २. पश्चात् उठ करके व जिनेन्द्रादिसे प्रार्थना करके पुनः बैठना, ३. तत्पश्चात् फिरसे उठते हुए सामायिक दण्डकसे आत्मशुद्धि करके शरीरादिसे ममत्वके परित्यागपूर्वक जिनगुणोंका चिन्तन आदि करते हुए फिरसे भी भूमिमें बैठना । सामायिकके आदिमें, उसकी समाप्तिमें, थोस्सामिदण्डकके प्रारम्भमें और उसके अन्तमें शिरको झुकाकर जो नमस्कार किया जाता है; उसका नाम चतुःशिर है । सामायिक एवं थोस्सामिदण्डकके आदि-अन्तमें जो मन, वचन और कायके बारह (४४३) विशुद्धिपरावर्तन वार होते हैं वे द्वादशावर्त कहे जाते हैं। जं तं भावकम्मं णाम ॥२९॥ उवजुत्तो पाहुड-जाणगो तं सव्वं भावकम्मं णाम ॥ अब भावकर्मका अधिकार है ॥ २९ ॥ जो तद्विषयक उपयोगसे युक्त हो करके कर्मप्राभृतका ज्ञाता है वह सब भावकर्म है ।। ३० ॥ एदेसि कम्माणं केण कम्मेण पयदं ? समोदाणकम्मेण पयदं ॥ ३१ ॥ इन सब कोंमेंसे यहां कौनसा कर्म प्रकृत है ? उनमें यहां समवधान कर्म प्रकृत है ॥ ॥ इस प्रकार कर्मानियोगद्वार समाप्त हुआ ॥ ४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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