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________________ ४, २, १३, १८२ ] वेयणमहाहियारे वेयणसण्णियासविहाणं [६६७ उसके कालकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १६७ ॥ उसके वह नियमसे अजघन्य और असंख्यातगुणी अधिक होती है ।। १६८ ॥ जस्स णामवेयणा दव्वदो जहण्णा तस्स खेत्तदो किं जहण्णा अजहण्णा? ॥१६९॥ णियमा अजहण्णा असंखेज्जगुणब्भहिया ॥ १७० ॥ जिसके नामकर्मकी वेदना द्रव्यकी अपेक्षा जघन्य होती है उसके क्षेत्रकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १६९ ॥ उसके वह नियमसे अजघन्य होकर असंख्यातगुणी अधिक होती है ॥ १७० ।। तस्स कालदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ १७१ ॥ जहण्णा ॥ १७२ ॥ उसके कालकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १७१ ॥ वह उसके जघन्य होती है ॥ १७२ ।।। तस्स भावदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ १७३ ॥ णियमा अजहण्णा अणंतगुणब्भहिया ॥ १७४ ॥ उसके भावकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १७३ ॥ उसके वह नियमसे अजघन्य और अनन्तगुणी अधिक होती है ॥ १७४ ॥ जस्स णामवेयणा खेत्तदो जहण्णा तस्स दव्वदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ १७५ ॥ णियमा अजहण्णा चउट्ठाणपदिदा ॥ १७६ ॥ __ जिसके नामकर्मकी वेदना क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्य होती है उसके द्रव्यकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १७५ ॥ उसके वह नियमसे अजघन्य होकर चार स्थानोंमें पतित होती है ॥ १७६ ॥ तस्स कालदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ १७७ ॥ णियमा अजहण्णा असंखेज्जगुणब्भहिया ॥ १७८ ॥ उसके कालकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १७७ ॥ उसके वह नियमसे अजघन्य और असंख्यातगुणी अधिक होती है ॥ १७८ ॥ तस्स भावदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥ १७९ ॥ जहण्णा वा अजहण्णा वा, जहण्णादो अजहण्णा छट्ठाणपदिदा ॥ १८० ॥ उसके भावकी अपेक्षा वह क्या जघन्य होती है या अजघन्य ? ॥ १७९॥ उसके वह जघन्य भी होती है और अजघन्य भी। जघन्यकी अपेक्षा वह अजघन्य छह स्थानोंमें पतित होती है ॥ १८० ॥ जस्स णामवेयणा कालदो जहण्णा तस्स दव्वदो किं जहण्णा अजहण्णा ? ॥१८१ ॥ जहण्णा वा अजहण्णा वा, जहण्णादो अजहण्णा पंचट्ठाणपदिदा ॥ १८२ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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