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________________ ६४ ] छक्खंडागम क्षपितकर्माशिक कहते हैं। इसका खुलासा यह है कि जो जीव पल्योपमके असंख्यातवें भागसे हीन कर्मस्थितिप्रमाणकाल तक सूक्ष्मनिगोदिया जीवोंमें रहा है, उसमें परिभ्रमण करते हुए जो अपर्याप्तोंमें बहुत वार और पर्याप्तोंमें थोड़े ही वार उत्पन्न हुआ है, जिसका अपर्याप्तकाल बहुत और पर्याप्तकाल थोड़ा रहा है, वह जब जब आयुको बांधता है, तब तब तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट योगसे बांधता है, उपरिम स्थितियोंके निषेकके जघन्य पदको और अधस्तन स्थितियोंके निषेकके उत्कृष्ट पदको करता है, वार वार जघन्य योगस्थानको प्राप्त होता है, वार वार मन्द संक्लेशरूप परिणामोंसे परिणत होता है। इस प्रकारसे निगोदिया जीवोंमें परिभ्रमण करके पश्चात् जो बादर पृथ्वीकायिक पर्याप्तोंमें उत्पन्न होकर वहां सर्वलघु अन्तर्मुहूर्तकालमें सब पर्याप्तियोंसे पर्याप्त हुआ है। तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्तमें मरणको प्राप्त होकर जो पूर्वकोटीकी आयुवाले मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ है, वहांपर जितने गर्भसे निकलने के पश्चात् आठ वर्षका होकर संयमको धारण किया है, कुछ कम पूर्वकोटीवर्षतक संयमका पालन करके जीवनके स्वल्प शेष रह जानेपर मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है, जो मिथ्यात्वसम्बधी सबसे कम असंयमकालमें रहा है, तत्पश्चात् मिथ्यात्वके साथ मरणको प्राप्त होकर जो दश हजार वर्षकी आयुवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ है, वहांपर जो सबसे छोटे अन्तर्मुहूर्त कालके द्वारा सब पर्याप्तियोंसे पर्याप्त हुआ है, पश्चात् अन्तर्मुहूर्तमें जो सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ है। इस प्रकार उस देवपर्यायमें कुछ कम दश हजार वर्ष तक सम्यक्त्वका परिपालन कर जीवनके स्वल्प शेष रह जानेपर पुनः मिथ्यात्वको प्राप्त हुआ है और मिथ्यात्वके साथ मरणकर जो पुनः बादर पृथ्वीकायिक पर्याप्तोंमें उत्पन्न हुआ है, वहांपर सर्वलघु अन्तर्मुहूर्त कालमें सब पर्याप्तियोंसे पर्याप्त हुआ है, तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्तमें मृत्युको प्राप्त होकर जो सूक्ष्मनिगोदिया पर्याप्त जीवोंमें उत्पन्न हुआ है, पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थितिकाण्डकघातोंके द्वारा पत्योपमके पल्योपमके असंख्यातवें भागमात्र कालमें कर्मको हतसमुत्पत्तिक करके जो पुनः बादर पृथ्वीकायिक पर्याप्तोंमें उत्पन्न हुआ है, इस प्रकार नाना भवग्रहणोंमें आठ संयमकाण्डकोंको पालनकर, चार वार कषायोंको उपशमाकर, पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण संयमासंयमकाण्डका और इतने ही सम्यक्त्वकाण्डकोंका परिपालन करके उपर्युक्त प्रकारसे परिभ्रमण करता हुआ जो पुनरपि पूर्वकोटिकी आयुवाले मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ है, यहां सर्व लघु कालमें जन्म लेकर आठ वर्षका हुआ है, पश्चात् संयमको प्राप्त होकर और कुछ कम पूर्वकोटि काल तक उसका परिपालन करके जीवनके स्वल्प शेष रह जानेपर दर्शनमोह और चारित्रमोहकी क्षपणा करता हुआ छद्मस्थ अवस्थाके अर्थात् बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समयको प्राप्त होता है, उस जीवके उस अन्तिम समयमें ज्ञानावरणीयकर्मकी सर्व जघन्य द्रव्यवेदना होती है । इससे भिन्न जीवोंके अजघन्यवेदना जाननी चाहिए । जो जीव ज्ञानावरणीयकर्मकी जघन्य द्रव्यवेदनाका स्वामी है, वही दर्शनावरणीय और अन्तरायकर्मकी भी जघन्य द्रव्यवेदनाका स्वामी जानना चाहिए। मोहकर्मकी जघन्य द्रव्यवेदना Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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