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________________ प्रस्तावना [६३ है ( उत्कर्षणापकर्षण आवास ) । जो बहुत वार उत्कृष्ट योगस्थानोंको प्राप्त होता है (योगावास )। जो बहुत वार मन्द संक्लेश परिणामोंको प्राप्त होता है ( संक्लेशावास)। इस प्रकार परिभ्रमण करनेके पश्चात् जो बादर त्रस पर्याप्त जीवोंमें उत्पन्न हुआ है। उनमें परिभ्रमण करते हुए जो पूर्वोक्त भवावास, अद्धावास, आयु-आवास, उत्कर्षणापकर्षणावास, योगावास और संक्लेशावासको बहुत बार प्राप्त होता है । इस प्रकारसे परिभ्रमण करता हुआ जो अन्तिम भवग्रहणमें सातवीं पृथ्वीके नारकियोंमें उत्पन्न होकरके प्रथम समयवर्ती आहारक और प्रथम समयवर्ती तद्भवस्थ होते हुए जो उत्कृष्ट योगसे आहारको ग्रहण करता है, उत्कृष्ट वृद्धिसे वृद्धिंगत होता है, सर्व लघु अन्तर्मुहूर्तकालमें जो सर्व पर्याप्तियोंसे पर्याप्त होता है । पश्चात् तेतीस सागरोपम काल तक वहां रहते हुए बहुत बहुत वार उत्कृष्ट योगस्थानोंको, तथा वार वार अतिसंक्लेश परिणामोंको प्राप्त होता है । इस प्रकारसे आयु व्यतीत करते हुए जीवनके अल्प अवशिष्ट रह जानेपर जो योगयवमध्यके ऊपर अन्तर्मुहूर्त काल तक रहता है, अन्तिम जीवगुणहानिस्थानान्तरमें जो आवलीके असंख्यातवें भाग काल तक रहता है, जो द्विचरम और त्रिचरम समयमें उत्कृष्ट संक्लेशको प्राप्त होता है, तथा चरम और द्विचरम समयमें जो उत्कृष्ट योगको प्राप्त होता है, ऐसे उस नारक भवके अन्तिम समयमें . स्थित जीवको गुणितकौशिक कहते हैं। उसके ज्ञानावरणादि सात कर्मोकी उत्कृष्ट द्रव्यवेदना होती है। कहनेका अभिप्राय यह है कि उक्त जीवके उतने काल तक कर्मरूपद्रव्यका संचय उत्तरोत्तर क्रमसे बढ़ता ही जाता है और अन्तिम समयमें उसके ज्ञानावरणादि सात कर्मोका वेदनाका द्रव्य सर्वोत्कृष्ट पाया जाता है । आयुकर्मकी उत्कृष्ट द्रव्यवेदनाके स्वामीकी प्ररूपणा करते हुए बतलाया गया है कि पूर्वकोटी वर्षप्रमाण आयुका धारक जो जीव जलचर जीवोंमें पूर्वकोटीप्रमाण आयुको दीर्घ आयुबन्धक काल, तत्प्रायोग्य संक्लेश और तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट योगकेद्वारा बान्धता है, योगयवमध्यके ऊपर अन्तर्मुहूर्त काल रहा है, अन्तिम जीवगुणहानिस्थानान्तरमें आवलीके असंख्यातवें भाग रहा है, तत्पश्चात् क्रमसे मरणकर पूर्वकोटीकी आयुवाले जलचरजीवोंमें उत्पन्न हुआ है, वहांपर सर्वलघु अन्तर्मुहूर्तमें सब पर्याप्तियोंसे पर्याप्त हुआ है, दीर्घ आयुबन्धककालमें तत्प्रायोग्य उत्कृष्ट योगके द्वारा . पूर्वकोटिप्रमाण आयुको पुनः दूसरी बार बांधता है, योगयवमध्यके ऊपर अन्तर्मुहूर्त काल तक रहता है, अन्तिम गुणहानिस्थानान्तरमें आवलीके असंख्यातवें भाग काल तक रहता है, जो तथा बहुत बहुत वार सातावेदनीयके बन्ध-योग्य कालसे संयुक्त हुआ है, ऐसे जीवके अनन्तर समयमें जब परभवसम्बन्धी आयुके बन्धकी समाप्ति होती है, उस समय उसके आयुकर्मकी उत्कृष्ट द्रव्यवेदनासे होती है । सभी कर्मीकी उत्कृष्ट द्रव्यवेदनासे भिन्न अनुत्कृष्ट द्रव्यवेदना जाननी चाहिए । ज्ञानावरणीयकर्मकी जघन्य द्रव्यवेदनाका स्वामी क्षपितकर्मांशिक जीव बतलाया गया है। जिस जीवके विवक्षित कर्मद्रव्यका संचय उत्तरोत्तर क्षय होते हुए सबसे कम रह जावे, उसे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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