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________________ ६४४] छक्खंडागमे वेयणाखंड [ ४, २, ८, १६ एवं सत्तण्णं कम्माणं ॥ १६ ॥ - इसी प्रकार शब्दनयकी अपेक्षा शेष सात कोकी वेदना विषयमें भी प्ररूपणा करनी चाहिये ॥ १६ ॥ ॥ वेदना-प्रत्यय-विधान समाप्त हुआ ॥ ८ ॥ ९. वेयणसामिचविहाणं वेयणसामित्तविहाणे ति ॥१॥ अब वेदनास्वामित्त्वविधान प्रकृत है ॥ १॥ णेगम-वहाराणं णाणावरणीयवेयणा सिया जीवस्स वा ॥२॥ नैगम और व्यवहार नयकी अपेक्षा ज्ञानावरणीयकी वेदना कथंचित् जीवके होती है ॥ सिया णोजीवस्स वा ॥३॥ कथंचित् वह नोजीवके होती है ॥ ३ ॥ अनन्तानन्त विलासोपचयोंके साथ उपचयको प्राप्त होनेवाले पुद्गलस्कन्धका नाम नोजीव है, क्यों कि, उसमें ज्ञान-दर्शनका अभाव भी है। उससे पृथग्भूत न होनेके कारण उससे सम्बद्ध जीवको भी यहां नोजीव पदसे ग्रहण किया गया है । सिया जीवाणं वा ॥४॥ उक्त वेदना कथंचित् बहुत जीवोंके होती है ॥ ४ ॥ सिया णोजीवाणं वा ॥५॥ कथंचित् वह बहुत नोजीवोंके होती है ॥ ५ ॥ सिया जीवस्स च णोजीवस्स च ॥६॥ वह कथंचित् एक जीव और एक नोजीव इन दोनोंके होती है ॥ ६ ॥ सिया जीवस्स च णोजीवाणं च ॥ ७ ॥ वह कथंचित् एक जीवके और बहुत नोजीवोंके होती हैं ॥ ७ ॥ सिया जीवाणं च णोजीवस्स च ॥८॥ वह कथंचित् बहुत जीवोंके और एक नोजीवके होती है ॥ ८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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