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________________ छक्खंडागमे वेयणाखंडं [ ४, २, ७, ३०० काण्डकके ऊपर और यवमध्यके नीचे स्पर्शनकाल उतना ही है ॥२९९ ॥ [७।६।५] जवमज्झस्स उवरिं फोसणकालो विसेसाहिओ [७।६।५।४।३२ ] ॥ ३०० ॥ उनसे यवमध्यके ऊपर स्पर्शनकाल विशेष अधिक है ।। ३०० ॥ [७।६।५।४।३।२] कंदयस्स हेढदो फोसणकालो विमेसाहिओ [४।५।६।७।८।७।६।५] ॥ ३०१ ॥ उससे काण्डकके नीचे स्पर्शनकाल विशेष अधिक है ॥३०१॥ [४।५।६।८।७।६।५] कंदयस्स उवरिं फोसणकालो विसेसाहिओ [५।६।७।८।७।६।५।४।३।२] ॥३०२॥ इससे काण्डकके ऊपर स्पर्शनकाल विशेष अधिक है [५।६।७।८।७।६।५।४।३।२] ॥ सव्वेस द्वाणेसु फोसणकालो विसेसाहिओ [४।५।६।७।८।७।६।५।४।३।२] ॥३०३॥ इससे सब स्थानोमें स्पर्शनकाल विशेष अधिक हैं [ ४।५।६।७।८।७।६।५।४।३।२] ॥ अप्पबहुए ति उक्कस्सए अणुभागबंधज्झवसाणट्ठाणे जीवा थोवा ॥ ३०४ ॥ अल्पबहुत्वकी अपेक्षा उत्कृष्ट अनुभागबन्धाध्यवसानस्थानमें जीव स्तोक हैं ।। ३०४ ॥ जहण्णए अणुभागबंधज्झवसाणट्ठाणे जीवा असंखेज्जगुणा ॥ ३०५॥ उनसे जघन्य अनुभागबन्धाध्यवसानस्थानमें जीव असंख्यातगुणे हैं ॥ ३०५ ।। कंदयस्स जीवा तत्तिया चेव ॥ ३०६ ॥ काण्डकके जीव उतने ही हैं ॥ ३०६ ॥ जवमज्झस्स जीवा असंखेज्जगुणा ।। ३०७ ॥ उनसे यवमध्यके जीव असंख्यातगुणे हैं ॥ ३०७ ॥ कंदयस्स उवरिं जीवा असंखेज्जगुणा ॥ ३०८ ॥ उनसे काण्डकके ऊपर जीव असंख्यातगुणे हैं ॥ ३०८ ॥ जवमज्झस्स उवरिं कंदयस्स हेट्ठिमदो जीवा असंखेज्जगुणा ॥ ३०९ ॥ उनसे यवमध्यके ऊपर और काण्डकके नीचे जीव असंख्यातगुणे हैं ॥ ३०९ ॥ कंदयस्स उवरिं जवमज्झस्स हेट्ठिमदो जीवा तत्तिया चेव ॥ ३१० ॥ काण्डकके ऊपर और यवमध्यके नीचे जीव उतने ही हैं ॥ ३१० ॥ जवमज्झस्स उवरिं जीवा विसेसाहिया ॥३११ ॥ उनसे यवमध्यके ऊपर जीव विशेष अधिक हैं ॥ ३११ ॥ कंदयस्स हेट्ठदो जीवा विसेसाहिया ॥३१२ ॥ उनसे काण्डकके नीचे जीव विशेष अधिक हैं ॥ ३१२ ॥ Jain Education international For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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