________________
६२४] छक्खंडागमे वेयणाखंडं
[४, २, ७, ११४ गुणहीणं ॥११४॥ णिरयाउअमणंतगुणहीणं ॥११५॥ मणुस्साउअमणंतगुणहीणं ॥११६॥ तिरिक्खाउअमणंतगुणहीणं ॥ ११७ ॥
पुरुषवेदसे रति अनन्तगुणी हीन है ॥ ११२ ॥ उससे हास्य अनन्तगुणा हीन है ॥ ११३ ॥ उससे देवायु अनन्तगुणी हीन है ॥ ११४ ॥ उससे नारकायु अनन्तगुणा हीन है ॥ ११५ ॥ उससे मनुष्यायु अनन्तगुणी हीन है ॥ ११६ ॥ उससे तिर्यगायु अनन्तगुणी हीन है ॥ ११७ ॥
॥ इस प्रकार चौंसठ पदवाला उत्कृष्ट महादण्डक समाप्त हुआ ।
संज-मण-दाणमोही लाभं सुदचक्खु-भोगं चक्खं च ।। आभिणिबोहिय परिभोग विरिय णव णोकसायाइं ॥ ४ ॥
संचलनचतुष्क, मनःपर्यज्ञानावरण, दानान्तराय, अवधिज्ञानावरण, लाभान्तराय, श्रुतज्ञानावरण, अचक्षुदर्शनावरण, भोगान्तराय, चक्षुदर्शनावरण, आभिनिबोधिकज्ञानावरण, परिभोगान्तराय, वीर्यान्तराय और नौ नोकषाय; ये प्रकृतियां उत्तरोत्तर अनन्तगुणी हैं ॥ ४ ॥
के-प-णि-अट्ठ-त्तिय-अण-मिच्छा-ओ-चे-तिरिक्ख-मणुसाऊ । तेय-कम्मसरीर तिरिक्ख-णिरय-देव-मणुवगई ॥५॥
केवलज्ञानावरण व केवलदर्शनावरण, प्रचला, निद्रा, आठ कषाय, स्त्यानगृद्धि आदि तीन, अनन्तानुबन्धिचतुष्क, मिथ्यात्व, औदारिकशरीर, वैक्रियिकशरीर, तिर्यगायु, मनुष्यायु, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, तिर्यग्गति, नरकगति, देवगति और मनुष्यगति; ये प्रकृतियां उत्तरोत्तर अनुभागकी अपेक्षा अनन्तगुणी हैं ॥ ५ ॥
णीचागोदं अजसो असादमुचं जसो तहा सादं । णिरयाऊ देवाऊ आहारसरीरणामं च ॥६॥
नीचगोत्र, अयशःकीर्ति, असातावेदनीय, उच्चगोत्र, यश:कीर्ति तथा सातावेदनीय, नारकायु, देवायु और आहारशरीर; ये प्रकृतियां उत्तरोत्तर अनन्तगुणी हैं ॥ ६ ॥
एत्तो जहण्णओ चउसद्विपदिओ महादंडओ काययो भवदि ॥ ११८ ॥ अब आगे चौंसठ पदवाला जघय महादण्डक किया जाता है ॥ ११८ ॥
सन्धमंदाणुभागं लोभसंजलणं ॥११९ ॥ मायासंजलणमणंतगुणं ॥१२० ॥ माणसंजलणमणंतगुणं ॥ १२१ ॥ कोधसंजलणमणंतगुणं ॥ १२२ ॥
संज्वलनलोभ सबसे मन्द अनुभागवाला है ॥ ११९ ।। उससे संज्वलन माया अनन्तगुणी है ॥ १२०॥ उससे संज्वलन मान अनन्तगुणा है ॥ १२१ ॥ उससे संज्वलन क्रोध अनन्तगुणा है ।
Jain Education International
For Private & Personal Use Only
www.jainelibrary.org