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________________ ४, २, ७, ११३ ] वेयणमहाहियारे वेयणभावविहाणे अप्पाबहुअं [ ६२३ श्रुतज्ञानावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय और भोगान्तराय ये तीनों ही प्रकृतियां तुल्य होती हुई चक्षुदर्शनावरणीयसे अनन्तगुणी हीन हैं ॥ ९५ ॥ ओहिणाणावरणीयं ओहिदसणावरणीयं लाहंतराइयं च तिण्णि वि तुल्लाणि अणंतगुणहीणाणि ॥९६ ॥ ___ उनसे अवधिज्ञानावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और लाभान्तराय; ये तीनों ही प्रकृतियां तुल्य होती हुईं अनन्तगुणी हीन हैं ॥ ९६ ॥ मणपज्जवणाणावरणीयं थीणगिद्धी दाणंतराइयं च तिण्णि वि तुल्लाणि अणंतगुणहीणाणि ॥ ९७ ॥ __ उनसे मनःपर्ययज्ञानावरणीय, स्त्यानगृद्धि और दानान्तराय; ये तीनों ही तुल्य होती हुई अनन्तगुणी हीन हैं ॥ ९७ ॥ ___णqसयवेदो अणंतगुणहीणो ॥ ९८॥ अरदि अणंतगुणहीणा ॥ ९९ ॥ सोगो अणंतगुणहीणो ॥ १०० ॥ भयमणंतगुणहीणं ॥१०१ ॥ उपर्युक्त मनःपर्ययज्ञानावरणीय आदिकी अपेक्षा नपुंसकवेद प्रकृति अनन्तगुणी हीन है ॥९८ ।। उससे अरति अनन्तगुणी हीन है ॥ ९९ ॥ उससे शोक अनन्तगुणा हीन है ॥१०॥ उससे भय अनन्तगुणा हीन है ॥ १०१ ॥ दुगुंछा अणंतगुणहीणा ॥१०२॥ णिहाणिद्दा अणंतगुणहीणा ॥१०३ ॥ पयलापयला अणंतगुणहीणा ॥१०४ ॥ णिद्दा य अणंतगुणहीणा ॥१०५॥ पयला अणंतगुणहीणा ॥ १०६ ॥ भयसे जुगुप्सा अनन्तगुणी हीन है ॥ १०२ ॥ उससे निद्रानिद्रा अनन्तगुणी हीन है ॥ १०३ ॥ उससे प्रचला प्रचला अनन्तगुणी हीन है ॥ १०४ ॥ उससे निद्रा अनन्तगुणी हीन है ॥ १०५ ॥ उससे प्रचला अनन्तगुणी हीन है ॥ १०६ ॥ अजसकित्ती णीचागोदं च दो वि तुल्लाणि अणंतगुणहीणाणि ॥ १०७॥ उससे अयशःकीर्ति और नीचगोत्र ये दोनों प्रकृतियां तुल्य होकर अनन्तगुणी हीन हैं । णिरयगई अणंतगुणहीणा ॥ १०८॥ तिरिक्खगई अणंतगुणहीणा ॥ १०९ ॥ इत्थिवेदो अणंतगुणहीणो ॥११० ॥ पुरिसवेदो अणंतंर्गुणहीणो ॥ १११ ॥ उक्त अयशःकीर्ति आदिकी अपेक्षा नरकगति अनन्तगुणी हीन है ॥ १०८ ॥ उससे तिर्यग्गति अनन्तगुणी हीन है ॥ १०९ ॥ उससे स्त्रीवेद अनन्तगुणा हीन है ॥ ११० ॥ उससे पुरुषवेद अनन्तगुणा हीन है ॥ १११ ॥ रदी अणंतगुणहीणा ॥ ११२ ॥ हस्समणंतगुणहीणं ॥ ११३ ॥ देवाउअमणंत Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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