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________________ ४, २, ७, १३८ ] वेयणमहाहियारे वेयणभावविहाणे अप्पाबहुअं [ ६२५ मणपज्जवणाणावरणीयं दाणंतराइयं च दो वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि ॥ १२३ ॥ संज्वलन क्रोधसे मनःपर्ययज्ञानावरणीय और दानान्तराय ये दोनों ही प्रकृतियां तुल्य होती हुईं अनन्तगुणी हैं ।। १२३ ॥ ओहिणाणावरणीयं ओहिदसणावरणीयं लाभंतराइयं च तिण्णि वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि ॥ १२४ ॥ उनसे अवधिज्ञानावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और लाभान्तराय ये तीनों ही प्रकृतिय तुल्य होती हुईं अनन्तगुणी हैं ॥ १२४ ॥ सुदणाणावरणीयं अचक्खुदंसणावरणीयं भोगंतराइयं च तिण्णि वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि ॥ १२५ ॥ ___ उनसे श्रुतज्ञानावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय और भोगान्तराय ये तीनों ही प्रकृतियां तुल्य होती हुई अनन्तगुणी हैं ॥ १२५ ॥ चक्खुदंसणावरणीयमणंतगुणं ॥ १२६ ॥ उनसे चक्षुदर्शनावरणीय अनन्तगुणी हैं ॥ १२६ ।। आभिणिबोहियणाणावरणीयं परिभोगंतराइयं च दो वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि ॥ उससे आभिनिबोधिकज्ञानावरणीय और परिभोगान्तराय ये दोनों ही प्रकृतियां तुल्य होती हुईं अनन्तगुणी हैं ॥ १२७ ॥ विरियंतराइयमणंतगुणं ॥ १२८ ॥ पुरिसवेदो अणंतगुणो ॥ १२९ ॥ हस्समणंतगुणं ॥ १३० ॥ रदी अणंतगुणा ॥ १३१ ॥ दुगुंछा अणंतगुणा ॥ १३२ ॥ भयमणंतगुणं ॥ १३३ ॥ लोगो अणंतगुणो ॥१३४ ॥ अरदी अणंतगुणा ॥१३५ ॥ इत्थिवेदो अणंतगुणो ॥ १३६ ॥णqसयवेदो अणंतगुणो ॥ १३७॥ आभिनिबोधिकज्ञानावरणीय आदिसे वीर्यान्तराय अनन्तगुणा है ॥ १२८ ॥ उससे पुरुषवेद अनन्तगुणा है ॥ १२९ ॥ उससे हास्य अनन्तगुणा है ॥१३०॥ उससे रति अनन्तगुणी है ॥ १३१ ॥ उससे जुगुप्सा अनन्तगुणी है ॥ १३२ ॥ उससे भय अनन्तगुणा है ।। १३३ ॥ उससे शोक अनन्तगुणा है ॥ १३४ ॥ उससे अरति अनन्तगुणी है ॥ १३५॥ उससे स्त्रीवेद अनन्तगुणा है ॥ १३६ ॥ उससे नपुंसकवेद अनन्तगुणा है ॥ १३७ ॥ केवलणाणावरणीयं केवलदंसणावरणीयं च दो वि तुल्लाणि अणंतगुणाणि ॥१३८॥ नपुंसकवेदसे केवलज्ञानावरणीय और केवलदर्शनावरणीय ये दोनों ही प्रकृतियां तुल्य होती हुई अनन्तगुणी हैं ॥ १३८ ॥ छ. ७९ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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