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________________ ५८४ ] वेयणमहाहियारे वेयणकालविहाणे सामित्तं [४, २, ६, २६ अण्णदरस्स चरिमसमयभवसिद्धियस्स तस्स वेयणीयवेयणा कालदो जहण्णा ॥ जो भी जीव भव्यसिद्धिककालके अन्तिम समयमें स्थित है उसके वेदनीयकी वेदना कालकी अपेक्षा जघन्य होती है ॥ १९ ॥ अभिप्राय यह है कि अयोगिकेवली गुणस्थानके अन्तिम समयमें वर्तमान भव्य जीवके उक्त वेदनीय कर्मकी वेदना जघन्य होती है, क्योंकि, वहां उसकी एक समय मात्र ही स्थिति शेष रहती है। तव्वदिरित्तमजहण्णा ॥ २० ॥ उस जघन्य वेदनासे भिन्न उसकी अजघन्य स्थितिवेदना होती है ॥ २० ॥ इसके भी स्वामियोंकी विविधता यथा सम्भव वेदनीय कर्मके समान ही समझना चाहिये । एवं आउअ-णामागोदाणं ॥ २१ ॥ इसी प्रकार आयु, नाम और गोत्र कर्मोकी भी जघन्य एवं अजघन्य कालवेदनाओंकी प्ररूपणा करना चाहिये ॥ २१ ॥ सामित्तेण जहण्णपदे मोहणीयवेयणा कालदो जहणिया कस्स ? ॥ २२ ॥ स्वामित्वके आश्रयसे जघन्य पदविषयक मोहनीय कर्मकी वेदना कालकी अपेक्षा जघन्य किसके होती है ? ॥ २२ ॥ ___ अण्णदरस्स खवगस्स चरिमसमयसकसाइयस्स मोहणीयवेयणा कालदो जहण्णा ।। जो भी क्षपक सकषाय अवस्थाके अन्तिम समयमें स्थित है उसके मोहनीय कर्मकी वेदना कालकी अपेक्षा जघन्य होती है ॥ २३ ॥ ___ अभिप्राय यह है कि सूक्ष्म साम्पराय गुणस्थानके अन्तिम समयमें वर्तमान क्षपक जीवके उस मोहनीय कर्मकी वेदना कालकी अपेक्षा जघन्य होती है । तव्यदिरित्तमजहण्णा ॥२४॥ मोहनीय कर्मकी उक्त जघन्य वेदनासे भिन्न उसकी अजघन्य वेदना होती है ॥ २४ ॥ स्वामित्व समाप्त हुआ । अप्पाबहुए ति । तत्थ इमाणि तिण्णि अणिओगद्दाराणि-जहण्णपदे उक्कस्सपदे जहण्णुक्कस्सपदे ॥ २५॥ अब अल्पबहुत्व अनुयोगद्वार अधिकार प्राप्त है। उसमें ये तीन अनुयोगद्वार हैं- जघन्य पदमें, उत्कृष्ट पदमें और जघन्य-उत्कृष्ट पदमें ॥ २५ ॥ जहण्णपदेण अट्ठण्णं पि कम्माणं वेयणाओ कालदो जहणियाओ तुल्लाओ ॥२६॥ जघन्य पदके आश्रित आठों ही कर्मोकी, कालकी अपेक्षा जघन्य वेदनायें तुल्य हैं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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