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________________ ५६८] वेयणमहाहियारे वेयणखेत्तविहाणे पदमीमांसा [४, २, ५, ६ उक्कस्सा वा अणुक्कस्सा वा जहण्णावा अजहण्णा वा ॥४॥ वह उत्कृष्ट भी है, अनुत्कृष्ट भी है, जघन्य भी है, और अजघन्य भी है ॥ ४ ॥ इनमें उसकी उत्कृष्ट क्षेत्रवेदना आठ राजु मात्र क्षेत्रमें मारणान्तिक समुद्घातको प्राप्त हुए महामत्स्यके पायी जाती है। इस मत्स्यको छोड़कर अन्यके वह अनुत्कृष्ट होती है। तीन समयवर्ती आहारक और तीन समयवर्ती तद्भवस्थ हुए सूक्ष्म निगोद जीवके वह जघन्य और उसके सिवाय अन्यके वह अजघन्य देखी जाती है। एवं सत्तण्णं कम्माणं ॥५॥ जिस प्रकार ज्ञानावरणीय कर्मकी क्षेत्र वेदनाविषयक पदोंका यहां विचार किया गया है उसी प्रकारसे शेष सात कर्मोंकी क्षेत्रवेदना विषयक पदोंका विचार करना चाहिये ॥५॥ सामित्तं दुविहं जहण्णपदे उक्कस्सपदे ॥ ६॥ स्वामित्व दो प्रकारका है- जघन्य पदविषयक और उत्कृष्ट पदविषयक ॥ ६ ॥ सामान्यतया नामस्थापनादिके भेदसे जघन्य चार प्रकारका है । उनमें भी द्रव्य जघन्यके दो भेद हैं- आगमद्रव्यजघन्य और नोआगमद्रव्यजघन्य । इनमें ज्ञायकशरीरादिके भेदसे नोआगमद्रव्यजघन्य भी तीन प्रकारका है । उनमें भी तद्व्यक्तिरिक्त नोआगमद्रव्यजघन्यके दो भेद हैं- ओघजघन्य और आदेशजघन्य । इनमें द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा ओघजघन्य भी चार प्रकारका है। उनमें द्रव्यकी अपेक्षा जघन्य एक परमाणु है। क्षेत्रजघन्य कर्मक्षेत्रजघन्य और नोकर्मक्षेत्रजघन्यके भेदसे दो प्रकारका है। इनमें सूक्ष्म निगोद जीवकी जो जघन्य अवगाहना है उसे कर्मक्षेत्रजघन्य और आकाशके एक प्रदेशको नोकर्मक्षेत्र जघन्य जानना चाहिये । कालकी अपेक्षा जघन्य एक समय माना गया है। परमाणुमें अवस्थित स्निग्धत्व आदिके अविभागी अंशको भावजघन्य जानना चाहिये । उक्त द्रव्य-क्षेत्रादिकी अपेक्षा आदेशजघन्य भी चार प्रकारका है । इनमें द्रव्यकी अपेक्षा आदेशजघन्य जैसे-तीन प्रदेशी स्कन्धकी अपेक्षा दो प्रदेशी स्कन्ध व चार प्रदेशी स्कन्धकी अपेक्षा तीन प्रदेशी स्कन्ध आदि । तीन आकाशप्रदेशोंमें अवगाहको प्राप्त द्रव्यकी अपेक्षा दो आकाशप्रदेशोंमें अवगाहको प्राप्त द्रव्य क्षेत्रकी अपेक्षा आदेशजघन्य माना जाता है। इसी प्रकाश शेष प्रदेशोंकी अपेक्षा भी इस आदेश क्षेत्रजघन्यकी कल्पना करना चाहिये। तीन समयादि परिणत द्रव्यकी अपेक्षा दो समयादि परिणत द्रव्य कालकी अपेक्षा आदेशजघन्य होता है। इसी प्रकार तीन आदि गुणोंसे (अंशोंसे) परिणत द्रव्यकी अपेक्षा दो आदि गुणोंसे परिणत द्रव्यको भावकी अपेक्षा आदेशजघन्य जानना चाहिये । इन सबमें ओघजघन्य प्रकरण प्राप्त है। ___जिस प्रकार जघन्यके इन भेद-प्रभेदोंका यहां स्वरूप कहा गया है उसी प्रकार यथासम्भव उत्कृष्टके भी उन भेद-प्रभेदोंका स्वरूप स्वयं जानना चाहिये । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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