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________________ ५६२] वेयणमहाहियारे वेयणदव्वविहाणे चूलिया [४, २, ४, १७९ एवमेक्केक्कस्स जोगगुणगारो पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो ॥ १७३ ॥ इस प्रकार प्रत्येक योगस्थानका गुणकार पल्योपमके असंख्यातवें भाग प्रमाण है ॥१७३॥ इस प्रकार योगअल्पबहुत्वको कहकर अब आगेके सूत्र द्वारा उसके कार्यस्वरूप प्रदेशअल्पबहुत्वकी सूचना की जाती है ___ पदेसअप्पाबहुए त्ति जहा जोगअप्पाबहुगं णीदं तधा णेदव्वं । णवरि पदेसा अप्पाए त्ति भाणिदव्वं ।। १७४ ।। जिस प्रकार योगअल्पबहुत्वकी प्ररूपणा की गई है उसी प्रकारसे प्रदेशअल्पबहुत्यकी प्ररूपणा करना चाहिये । विशेष इतना है कि योगके स्थानमें यहां ‘प्रदेश' ऐसा कहना चाहिये । जोगहाणपरूवणदाए तत्थ इमाणि दस अणियोगद्दाराणि णादव्वाणि भवंति ॥ योगस्थानोंकी प्ररूपणामें ये दस अनुयोगद्वार जानने योग्य हैं ॥ १७५ ॥ यहां योगके अनेक भेदोंमेंसे नोआगमभावयोगके अन्तर्गत जुंजणयोगके भेदभूत उपपादयोग, एकान्तानुवृद्धियोग और परिणाम योगोंको ग्रहण करना चाहिये; क्यों कि, कर्मप्रदेशोंका आगमन इनको छोड़कर अन्य किसी योगके द्वारा नहीं होता । अविभागपडिच्छेदपरूवणा वग्गणपरूवणा फद्दयपरूवणा अंतरपरूवणा ठाणपरूवणा अणंतरोवनिधा, परंपरोवणिधा, समयपरूवणा, वढिपरूवणा अप्पावहुए ति ॥ १७६ ॥ __ अविभागप्रतिच्छेदप्ररूपणा, वर्गणाप्ररूपणा, स्पर्धकप्ररूपणा, अन्तरप्ररूपणा, स्थानप्ररूपणा, अनन्तरोपनिधा, परम्परोपनिधा, समयप्ररूपणा, वृद्धिप्ररूपणा और अल्पबहुत्व; ये उक्त दस अनुयोगद्वार हैं ॥ १७६ ॥ अविभागपडिच्छेदपरूवणाए एक्केक्कम्हि जीवपदेसे केवडिया जोगाविभागपडिच्छेदा ? ॥ १७७ ॥ ____ अविभागप्रतिच्छेदप्ररूपणाके अनुसार एक एक जीवप्रदेशके आश्रित कितने योगाविभागप्रतिच्छेद होते हैं ? ॥ १७७ ॥ असंखेज्जा लोगा जोगाविभागपडिच्छेदा ॥ १७८ ॥ एक एक जीवप्रदेशके आश्रित असंख्यात लोक प्रमाण योगाविभागप्रतिच्छेद होते हैं । एक जीवप्रदेशपर जो जघन्य योग स्थित है उसको असंख्यात लोकोंसे भाजित करनेपर जो एक भाग प्राप्त हो उसका नाम अविभागप्रतिच्छेद है । इस अविभागप्रतिच्छेदके प्रमाणसे एक एक जीवप्रदेशपर असंख्यात लोक मात्र योगाविभाग प्रतिच्छेद रहते हैं, यह सूत्रका अभिप्राय समझना चाहिये । एवडिया जोगाविभाग पडिच्छेदा ॥ १७९ ॥ एक एक जीव प्रदेशपर इतने मात्र योगाविभाग प्रतिच्छेद होते हैं ॥ १७९ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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