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________________ ४, २, ४, १८० ] छक्खंडागमे वेयणाखंड [ ५६३ वग्गणपरूवणदाए असंखेज्जलोगजोगाविभागपडिच्छेदाणमेयावग्गणा भवदि || वर्गणाप्ररूपणा के अनुसार असंख्यात लोक मात्र योगाविभाग प्रतिच्छेदों की एक वर्गणा होती है ॥ १८० ॥ एवमसंखेज्जाओ वग्गणाओ सेढीए असंखेज्जदिभागमेत्ताओ ।। १८१ ॥ इस प्रकार श्रेणिके असंख्यातवें भाग मात्र असंख्यात वर्गणायें होती हैं ॥ १८९ ॥ जितने जीव प्रदेशयोगविभागप्रतिच्छेदों की अपेक्षा समान हों उनके समूहका नाम एक वर्गणा है | इसके आगे योगाविभागप्रतिच्छेदों की अपेक्षा परस्पर समान, परन्तु पूर्व वर्गणा सम्बन्धी जीवप्रदेशों के योगाविभागप्रतिच्छेदोंसे अधिक व आगेकी वर्गणाओं सम्बन्धी एक एक जीवप्रदेशस्थ योगाविभागप्रतिच्छेदोंसे हीन; ऐसे अन्य जीव प्रदेशोंके समूहका नाम दूसरी वर्गणा है । इस प्रकारके विधान से ग्रहण की गई वे सब वर्गणायें श्रेणिके असंख्यातवें भाग प्रमाण होती हैं । फदयपरूवणाए असंखेज्जाओ वग्गणाओ सेडीए असंखेज्जदिभागमेत्तीयो, तमेगं फद्दयं होदि ।। १८२ ॥ स्पर्धकप्ररूपणा के अनुसार श्रेणिके असंख्यातवें भाग मात्र जो असंख्यात वर्गणायें हैं उनका एक स्पर्धक होता है ॥ १८२ ॥ जिन एक एक जीव प्रदेशपर समान संख्या में जवन्य योगके अविभागप्रतिच्छेद पाये जाते हैं उन प्रत्येक जीव प्रदेशों का नाम वर्ग व उनके समूहका नाम प्रथम वर्गणा है । इसके आगे पूर्व वर्ग अविभाप्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा एक अविभागप्रतिच्छेद मात्र से अधिक जितने जीव प्रदेश हों उन सबके समूहका नाम द्वितीय वर्गणा है । इस प्रकार उत्तरोत्तर एक एक अविभागप्रतिच्छेद से वृद्धिंगत योगाविभागप्रतिच्छेदोंसे युक्त जीवप्रदेशों के समूहसे क्रमशः तृतीय- चतुर्थ आदि वर्गणायें होती हैं । ये वर्गणायें एक स्पर्धकमें जगश्रेणिके असंख्यातवें भाग मात्र असंख्यात होती हैं । एवमसंखेज्जाणि फद्दयाणि सेडीए असंखेज्जदिभागमेत्ताणि ॥ १८३ ॥ इस प्रकार एक योगस्थान में श्रेणिके असंख्यातवें भाग मात्र असंख्यात स्पर्धक होते हैं || अंतरपरूवणदा एक्क्क्स्स फद्दयस्स केवडियमंतरं ? असंखेज्जा लोगा अंतरं ॥ अन्तरप्ररूपणाके अनुसार एक एक स्पर्धकका कितना अन्तर होता है ? असंख्यात लोक प्रमाण अन्तर होता है ॥ १८४ ॥ प्रथम स्पर्धकके उपर प्रथम स्पर्धकके ही बढ जानेपर द्वितीय स्पर्धक होता है । कारण इसका यह है कि प्रथम स्पर्धककी प्रथम वर्गणा सम्बन्धी एक वर्गसे द्वितीय स्पर्धकसम्बन्धी प्रथम एक वर्ग विभागप्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा दुगुणा ही होता है । वदयतरं ।। १८५ ॥ सब स्पर्धकोंके बीच इतना ही अन्तर होता है ॥ १८५ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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