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________________ ४, २, ४, ४०] छक्खंडागम वेयणाखंड [५४७ आयुवालोंमें उत्पन्न हुआ' ऐसा कहा गया है । सूत्रमें ‘जलचर जीवोंमें उत्पन्न हुआ' यह जो कहा गया है उसका अभिप्राय यह है कि जीव जिस प्रकार देवगति आदि अन्य कर्मोको बांधकर भी वहां न उत्पन्न हो अन्यत्र भी उत्पन्न हो सकता है उस प्रकार आयुके विषयमें यह सम्भावना नहीं है । किन्तु जिस गति सम्बन्धी आयु बांधी गई है वहां ही जीव निश्चयसे उत्पन्न होता है, अन्यत्र उत्पन्न नहीं होता। अंतोमुहुत्तेण सबलहुं सव्वाहि पज्जत्तीहि पज्जत्तयदो ॥ ४० ॥ अन्तर्मुहूर्त काल द्वारा अति शीघ्र सब पर्याप्तियोंसे पर्याप्तक हुआ ॥ ४० ॥ पर्याप्तियोंके पूर्ण होनेका वह अन्तर्मुहूर्त काल जघन्य भी है और उत्कृष्ट भी हैं। उसमें उत्कृष्ट कालका प्रतिषेध करनेके लिये 'सर्वलघु' पदका ग्रहण किया है। उत्कृष्ट कालके प्रतिषेध करनेका कारण यह है कि दीर्घ कालके द्वारा बहुत गोपुन्छाओंके गल जानेसे बहुत निषेकोंकी निर्जरा सम्भव है जो प्रकृतमें अभीष्ट नहीं है । एक-दो पर्याप्तिपोंके पूर्ण होनेपर पर्याप्त हुआ जीव आयुबन्धके योग्य नहीं होता, किन्तु सभी-पर्याप्तियोंसे पर्याप्त हुआ जीव ही आयुबन्धके योग्य होता है; इस बातका ज्ञान करानेके लिये सूत्रमें 'सब पर्याप्तियोंसे पर्याप्तक हुआ' ऐसा कहा गया है । अंतोमुहुत्तेण पुणरवि परभवियं पुव्वकोडाउअंबंधदि जलचरेसु ॥ ४१ ।। अन्तर्मुहूर्त कालके द्वारा फिर भी वह जलचरोंमें परभव सम्बन्धी पूर्वकोटि प्रमाण आयुको बांधता है ॥ ४१ ॥ अन्य आयुबन्धकों आयुबन्धकालकी अपेक्षा चूंकि जलचर जीवों सम्बन्धी आयुबन्धककाल दीर्घ होता है, अत एव फिरसे भी यहां उन जलचर जीवों सम्बन्धी पूर्वकोटि प्रमाण आयुको बंधाया गया है। दीहाए आउअबंधगद्धाए तप्पाओग्गउक्कस्सजोगेण बंधदि ॥ ४२ ॥ दीर्घ आयुबन्धककालके भीतर उसके योग्य उत्कृष्ट योगसे उस आयुको बांधता है ॥४२॥ जोगजवमज्झस्सुवरि अंतोमुहुत्तद्धमच्छिदो ॥४३॥ योगयवमध्यके ऊपर अन्तर्मुहूर्त काल तक रहा ॥ ४३ ॥ चरिम जीवगुणहाणिट्ठाणंतरे आवलियाए असंखेज्जदिभागमच्छिदो ॥४४॥ अन्तिम जीवगुणहानिस्थानान्तरमें आवलीके असंख्यातवें भाग काल तक रहा ॥ ४४ ॥ बहुसो बहुसो सादद्धाए जुत्तो ॥ ४५ ॥ बहुत बहुत वार साताकालसे युक्त हुआ ॥ ४५ ॥ सातावेदनीयके बन्धके योग्य कालका नाम साताकाल और असातावेदनीयके बन्धके योग्य संक्लेशकालका नाम असाताकाल है । अवलम्बना करणके द्वारा गलनेवाले बहुत द्रव्यका निषेध करनेके लिये यहां साताकालस्वरूपसे बहुत बार परिणमाया गया है । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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