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________________ ४, १, ६९] कदिअणियोगद्दारे कदिपरूवणा [५३१ कदी आहारसरीर मूलकरणकदी तेयासरीरमूलकरणकदी कम्मइयसरीरमूलकरणकदी चेदि । करणकृति दो प्रकारकी है- मूलकरणकृति और उत्तरकरणकृति । इनमें मूलकरणकृति पांच प्रकारकी हैं-- औदारिकशरीर मूलकरणकृति, वैक्रियिकशरीर मूलकरणकृति, तैजसशरीर मूलकरणकृति और कार्मणशरीर मूलकरणकृति ॥ ६८ ॥ सब करणोंमें शरीरको मूलकरण माना जाता है, कारण कि अन्य करणोंकी प्रवृत्ति उसके ही निमित्तसे होती है। वह औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मणके भेदसे पांच प्रकारका है । इन पांच शरीरात्मक मूलकरणोंका जो संघातन आदिरूप कार्य है उसे मूलकरणकृति कही जाती है । शरीरके अतिरिक्त जो तलवार, वसूला, परशु एवं कुदारी आदि अन्य करण हैं उनके कार्यको उत्तरकरणकृति जाननी चाहिये। इन सबके कार्यको जो कति कही गयी है वह 'क्रियते इति कृतिः' इस निरुक्तिके अनुसार भावकी प्रधानतासे कही गया है। ‘क्रियते अनया' . इस व्युत्पत्तिके अनुसार करणकी प्रधानतासे उक्त मूल और उत्तर करणोंको कृति समझनी चाहिये । अब उपर्युक्त पांच भेदोंमें प्रत्येकके भेदोंको बतलानेके लिये आगेका सूत्र प्राप्त होता है जा सा ओरालिय उब्बिय-आहारसरीरमूलकरणकदी णाम सा तिविहा-संघादणकदी परिसादणकदी संघादण-परिसादणकदी चेदि । सा सव्वा ओरालिय उब्बिय-आहारसरीरमूलकरणकदी णाम ॥ ६९ ॥ जो वह औदारिक वैक्रियिक-आहारकशरीर मूलकरणकृति है वह तीन प्रकारकी हैसंघातनकृति, परिशातनकृति और संघातन-परिशातनकृति । वह सब औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीरमूलकरणकृति है ॥ ६९ ॥ इनमेंसे विवक्षित शरीरके परमाणुओंका निर्जराके विना जो संचय होता है उसे संघातनकृति कहते हैं । उन्हीं विवक्षित शरीरके पुद्गलस्कन्धोंकी संचयके विना जो निर्जरा होती है वह परिशातनकृति कहलाती है। तथा विवक्षित शरीरके पुद्गलस्कन्धोंका जो आगमन और निर्जरा एकही साथ होती है उसे संघातन-परिशातनकृति कही जाती है। उनमेंसे तिर्यंच और मनुष्योंके उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें औदारिकशरीरकी संघातनकृति ही होती है, क्यों कि, उस समय उक्त शरीरके स्कन्धोंकी निर्जरा नहीं पायी जाती। द्वितीय समयसे लेकर आगेके समयोंमें उन्हींके औदारिकशरीरकी संघातन-परिशातनकृति होती है, क्यों कि, द्वितीयादिक समयोंमें अभव्यसिद्धिकोंसे अनन्तगुणे और सिद्धोंसे अनन्तगुणे हीन औदारिकशरीरके स्कन्धोंका आगमन और निर्जरा दोनों पाये जाते हैं। तथा तिर्यंच और मनुष्यों द्वारा उत्तर शरीरके उत्पन्न करनेपर औदारिकशरीरकी परिशातनकृति होती है, क्यों कि, उस समय औदारिकशरीरके रकन्धोंका आगमन सम्भव नहीं है। देव व नारकियोंके उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें वैक्रियिकशरीरकी संघातनकृति होती है, क्यों कि, उस समय वैक्रियिक शरीरके स्कन्धोंकी निर्जरा नहीं होती। उन्हींके द्वितीयादिक समयोंमें Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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