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________________ ५३० ] छक्खंडागमे वेयणाखंडं [४, १, ६७ __ तीनको आदि लेकर जिस किसी भी संख्याके वर्गित करनेपर चूंकि वह बढ़ती है और उसमेंसे वर्गमूलको कम करके पुनः वर्ग करनेपर वृद्धिको भी प्राप्त होती है; इसी कारण उसे 'कृति' कही जाती है । यह तृतीय गणनाकृतिका विधान है। इनके अतिरिक्त चतुर्थ कोई गणनाकृति नहीं हैं, क्यों कि, इन तीनोंको छोड़कर और दूसरी कोई गणना पायी नहीं जाती। अभिप्राय यह है कि 'एक-एक' ऐसी गणना करनेपर नोकृतिगणना, 'दो-दो' इस प्रकार गणना करनेपर अवक्तव्य गणना, तथा 'तीन-चार व पांच' इत्यादि क्रमसे गणना करनेपर कृतिगणना कहलाती है। इस प्रकार गणनाकृति तीन प्रकार ही है । जा सा गंथकदी णाम सा लोए वेदे समए सद्दपबंधणा अक्खरकबादीणं जा च गंथरचणा कीरदे सा सव्या गंथकदी णाम ।। ६७ ॥ . जो वह ग्रन्थकृति है वह लोकमें, वेदमें वे समयमें शब्दसन्दर्भरूप अक्षरात्मक काव्यादिकोंके द्वारा जो ग्रन्थरचना की जाती है वह सब ग्रन्थकृति कहलाती है । ६७ ॥ - यह ग्रन्थकृति नाम, स्थापना, द्रव्य और भावके भेदसे चार प्रकारकी है। उनमें भाव ग्रन्थकृति आगम और नोआगमके भेदसे दो प्रकारकी है। इनमें ग्रन्थकृति प्राभृतका जानकार उपयुक्त जीव आगमभावग्रन्थकृति कहलाता है । नोआगमभाव ग्रन्थकृति श्रुत और नोश्रुतके भेदसे दो प्रकारकी है। उनमें श्रुत तीन प्रकारका है- लौकिक, वैदिक और सामायिक । इनमेंसे प्रत्येक द्रव्य और भाव श्रुतके भेदसे दो प्रकारका है । उनमेंसे शब्दात्मक द्रव्यश्रुत तद्व्यतिरिक्त नोआगमद्रव्यग्रन्थकृतिमें गर्भित है । हाथी, घोड़ा, तंत्र, कोटिल्य एवं वात्सायन कामशास्त्रादि विषयक ज्ञान लौकिक भावश्रुत ग्रन्थ कहलाता है। द्वादशांगादिविषयक बोधका नाम वैदिक भावश्रुत ग्रन्थ है। तथा नैयायिक, वैशेषिक, लोकायत, सांख्य, मीमांसक और बौद्ध; इत्यादि दर्शनोंको विषय करनेवाला बोध सामायिक भावश्रुत ग्रन्थ कहा जाता है। इनकी शब्दसंदर्भरूप अक्षर-काव्योंद्वारा प्रतिपाद्य अर्थको विषय करनेवाली जो ग्रन्थरचना की जाती है वह श्रुतग्रन्थकृति कही जाती है । नोश्रुतग्रन्थकृति अभ्यन्तर और बाह्यके भेदसे दो प्रकारको है । इनमें अभ्यन्तर नोश्रुतग्रन्थकृति मिथ्यात्व, तीन वेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, क्रोध, मान, माया और लोभके भेदसे चौदह प्रकारकी तथा बाह्य नोश्रुतग्रन्थकृति क्षेत्र, वास्तु, धन, धान्य, दुपद, चतुष्पद, यान, शयनासन, कुप्य और भाण्डके भेदसे दस प्रकारकी है । ये क्षेत्रादि ग्रन्थ (परिग्रह) चूंकि अभ्यन्तर ग्रन्थके कारण होते हैं अतएव व्यवहार नयकी अपेक्षा कारणमें कार्यका उपचार करके इन्हें भी ग्रन्थ कहा जाता है । इनके परित्यागका नाम निर्ग्रन्थता है । मिथ्यात्वादिरूप उपर्युक्त चौदहकी ग्रन्थ' यह संज्ञा निश्चय नयकी अपेक्षा समझना चाहिये; क्यों कि, वे कर्मबन्धके कारण हैं । इनके परित्यागका नाम निर्ग्रन्थता है। . जा सा करणकदी णाम सा दुविहा मूलकरणकदी चे उत्तरकरणकदी चेव । जा सा मूलकरणकदी णाम सा पंचविहा-ओरालियसरीरमूल करणगदी वेउब्बियसरीर मूलकरण Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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