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________________ ५२६] छक्खंडागमे वेयणाखंडं [४, १, ५६ उन नौ आगमोंविषयक वाचना, पृच्छना, प्रतीच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षणा, स्तव, स्तुति, धर्मकथा तथा और भी इनको आदि लेकर जो अन्य हैं वे उपयोग हैं ॥ ५५ ॥ अन्य भव्य जीवोंके लिये शक्त्यनुसार उन नौ आगमोंविषयक ग्रन्थके अर्थकी जो प्ररूपणा की जाती है वह वाचना उपयोग है । उक्त आगमोंमें नहीं जाने हुए अर्थक विषयमें पूछना, इसका नाम पृच्छना उपयोग है । आचार्य भट्टारकोंके द्वारा कथित अर्थके निश्चय करनेका नाम प्रतिच्छना उपयोग है । ग्रहण किया हुआ अर्थ विस्मृत न हो जावे, एतदर्थ वार वार भावागमका परिशीलन करना; यह परिवर्तना उपयोग कहलाता है । कर्मोकी निर्जराके लिये पूर्ण रूपसे हृदयंगम किये गये श्रुतज्ञानके परिशीलन करनेका नाम अनुप्रेक्षणा उपयोग है । सब अंगोंके विषयकी प्रधानतासे बारह अंगोंके उपसंहार करनेको स्तव कहते हैं। इसमें जो वाचना, पृच्छना, परिवर्तना और अनुप्रेक्षणा स्वरूप उपयोग होता है उसे भी उपचारसे स्तव कहा जाता है। बारह अंगोंमें एक अंगके उपसंहारका नाम स्तुति है। साथ ही उसमें जो उपयोग होता है वह उसे भी स्तुति ही जानना चाहिये । एक अंगके एक अधिकारके उपसंहार और तद्विषयक उपयोगका नाम धर्मकथा है। . 'इनको आदि लेकर और भी जो अन्य हैं' ऐसा 'सूत्रमें' कहनेपर उससे अन्य जो कृति व वेदना आदि अधिकार हैं उनके उपसंहार विषयक उपयोगोंका भी ग्रहण करना चाहिये । ' उपयोग' शब्द यद्यपि सूत्रमें नहीं है तो भी अर्थापत्तिसे उसका यहां अध्याहार करना चाहिये । इस प्रकार यहां ये आठ श्रुतज्ञानोपयोग कहे गये हैं। __ यहां कृति अनुयोगद्वार प्रकृत है। तद्विषयक इन उपयोगोंको इस प्रकार समझना चाहिये- अन्य जीवोंके लिये कृतिके अर्थकी प्ररूपणा करना, वाचना कहलाती है। कृतिविषयक अज्ञात अर्थक विषयमें पूछनेका नाम पृच्छना है । तद्विषयक प्ररूपित किये जानेवाले अर्थका निश्चय करनेको प्रतीच्छना कहते हैं। विस्मरण न होने देनेके लिये वार वार कृतिके अर्थका परिशीलन करना, परिवर्तना कहलाती है । कर्मनिर्जराके लिये सांगीभूत कृतिका पुनः पुनः विचार करना अनुप्रेक्षणा कही जाती है । कृतिके उपसंहारके समस्त अनुयोगद्वारोंविषय उपयोगका नाम स्तव है । कृतिके एक अनुयोगद्वार विषयक उपयोगका नाम स्तुति है । एक मार्गणाविषयक उपयोग धर्मकथा कहलाता है । इस प्रकार ये कृतिविषयक आठ उपयोग हैं । इन उपयोगोंसे भिन्न जीव चाहे श्रुतज्ञानावरणके क्षयोपशमसे सहित हो अथवा उसके विनष्ट क्षयोपशमवाला हो, वह अनुपयुक्त कहलाता है। अब आगे नयोंके आश्रयसे अनुपयुक्तोंकी प्ररूपणा की जाती हैं णेगम-चवहाराणमेगो अणुवजुतो आगमदो दव्वकदी अणेया वा अणुवजुत्तो आगमदो दव्वकदी ॥ ५६ ॥ नैगम और व्यवहार नयकी अपेक्षा एक अनुपयुक्त जीव आगमसे द्रव्यकृति है अथवा अनेक अनुपयुक्त जीव आगमसे द्रव्यकृति है ॥ ५६ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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