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________________ प्रस्तावना [ ५१ यहां यह ध्यानमें रखना चाहिए कि सम्यक्त्व प्राप्तिके बाद यदि आयुबन्ध हो, तो नियमसे देवायुका ही बन्ध होता है। किन्तु यदि किसी जीवने मिथ्यात्वदशामें चारों गतियोंमेंसे किसी भी आयुका बन्ध कर लिया हो, और पीछे सम्यक्त्वकी प्राप्ति हो जाय, तो बंधी हुई आयु तो छूट नहीं सकती है, इसलिए उसे जाना तो उसी गतिमें पड़ता है, परन्तु सम्यक्त्वके माहात्म्य से वह पहले नरकसे नीचे नहीं उत्पन्न होगा । यदि तिर्यगायु बंध गई है, तो वह भोगभूमियां तिर्यंच होगा । यदि मनुष्यायु बंधी है, तो वह भोगभूमियां मनुष्य होगा। और यदि देवायु बंधी है, तो वह कल्पवासी ही देव होगा। यदि कोई आयु नहीं बंधी है और वह चरमशरीरी है तो क्षायिकसम्यक्त्वकी प्राप्तिके पश्चात् वह सर्व कर्मोकी क्षपणाके लिए उद्यत होता है और पुन: अधःकरणादि तीनों करणोंको करता और क्षपकश्रेणीपर चढ़ता हुआ दशवें गुणस्थानके अन्तमें मोहका क्षय करके क्षायिक चारित्रको प्राप्त करता है और अन्तर्मुहूर्तके भीतर ही ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तरायका क्षय करके अनन्त चतुष्टय और नवकेवल लब्धियोंका खामी अरहन्त बन जाता है और अन्तमें योग निरोध करके शेष अघातिया कर्मोंका भी क्षय करके परम पद मोक्षको प्राप्त हो जाता है। ___ ९ गति-आगतिचूलिका सर्व चूलिकाओंमें यह सबसे विस्तृत चूलिका है । विषय-वर्णनकी दृष्टि से इसके चार विभाग किये जा सकते हैं। जिनमेंसे सर्वप्रथम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिके बाहिरी कारण किस गतिमें कौन-कौनसे सम्भव हैं, इसका विस्तारसे वर्णन किया गया है । तत्पश्चात् चारों गतिके जीव मरण कर किस किस गतिमें जा सकते हैं और किस किस गतिसे किस किस गतिमें आ सकते हैं, इसका बहुत ही विस्तारसे वर्णन किया गया है । जिसका सार यह है कि देव मर कर देव नहीं हो सकता और न नारकी ही हो सकता है। इसी प्रकार नारकी जीव मर कर न नारकी हो सकता है और न देव ही। इन दोनों गतिके जीव मरण कर मनुष्य या तिर्यंचगतिमें आते हैं और मनुष्य- तिथंच ही मर कर इन दोनों गतियोंमें जाते हैं। हां, मनुष्यगतिके जीव मर कर चारों गतियोंमें जा सकते हैं और चारों गतिके जीव मरकर मनुष्यगतिमें आ सकते हैं । इसी प्रकार तिर्यंचगतिके जीव मर कर चारों गतियोंमें जा सकते हैं और चारों ही गतियोंके जीव मर कर तिर्यंचगतिमें आ सकते हैं। इसके पश्चात् यह बतलाया गया है कि किस गुणस्थानमें मरण कर कौनसी गतिका जीव किस किस गतिमें जा सकता है । इस प्रकरणमें अनेक ज्ञातव्य एवं महत्त्वपूर्ण बातों पर प्रकाश डाला गया है। जैसे कि कितने ही जीव मिथ्यात्वके साथ नरकमें जाते हैं और मिथ्यात्वके साथ ही निकलते हैं। कितने ही मिथ्यात्वके साथ जाते हैं और सासादनसम्यक्त्वके साथ निकलते हैं। कितने ही मिथ्यात्वके साथ नरकमें जाते हैं और सम्यक्त्वके साथ वहांसे निकलते हैं। इसी प्रकारसे शेष तीनों गतिके जीवोंकी गति-आगतिका निरूपण किया गया है । तत्पश्चात् बतलाया गया है कि नरक और Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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