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________________ ५० ] छक्खंडागम देवोंके वैभवके देखनेसे । बारहवें स्वर्गसे सोलहवें स्वर्ग तकके देव अन्तिम कारणको छोड़कर शेष तीन कारणोंसे सम्यक्त्वको उत्पन्न करते हैं। नौ प्रैवेयकोंके अहमिन्द्र जातिस्मरण और धर्मश्रवण इन दो ही कारणोंसे सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं। नव अनुदिश और पंच अनुत्तरवासी सभी देव सम्यग्दृष्टि ही होते हैं। . ___ इस प्रकार काललब्धिके प्राप्त होनेपर और उपर्युक्त अन्तरंग योग्यता और बाह्य निमित्त कारणोंके मिलनेपर यह जीव सर्वप्रथम उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त करता है। इन दोनों प्रकारके कारणोंके मिलनेपर उसके करणलब्धि प्रकट होती है, जिससे वह अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण परिणामोंके द्वारा दर्शनमोहके उपशमानेका प्रयत्न करता है । इन तीनों करणोंका स्वरूप गुणस्थानोंके वर्णन करते हुए बतला आये हैं। वहांपर इन तीनों करणोंको संयत जीव चारित्रमोहके उपशमन या क्षपणके लिए करता है; किन्तु यहांपर सातिशय मिथ्यादृष्टि जीव दर्शनमोहके उपशमन करनेके लिए करता है। प्रत्येक करणका काल अन्तर्मुहूर्त है और तीनोंका सम्मिलित काल भी अन्तर्मुहूर्त ही है। इनमेंसे अधःकरण और अपूर्वकरणके कालमें उत्तरोत्तर अपूर्व विशुद्धिको प्राप्त होकर प्रतिसमय कर्मोकी असंख्यातगुणी निर्जरा करता हुआ अनिवृत्तिकरण कालका बहुभाग बिताकर दर्शनमोहकर्मका अन्तरकरण करता हुआ उसके तीन टुकड़े कर देता है- जिनके नाम क्रमश: मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति हैं। जैसे कोदों ( धान्यविशेष ) को चक्कीसे दलनेपर उसके तीन भाग होते हैं- कुछ ज्यों के त्यों कोदोंके रूपमें रहते हैं, कुछके ऊपरके छिलके उतर जाते हैं और कुछ चढ़े रहते हैं और कुछके सभी छिलके अलग हो जाते हैं और निस्तुष चावल बन जाते हैं। जैसे ही एक दर्शनमोहके तीन तुकड़े होते हैं, उसी समय वह जीव उनका उपशम करके उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त कर लेता है। इस प्रकारसे प्रथमोपशम सम्यक्त्वकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके पश्चात् इसी चूलिकामें क्षायिकसम्यक्त्वकी उत्पत्तिका भी निरूपण किया गया है, जिसमें बतलाया गया है कि दर्शनमोहनीयकी क्षपणाका प्रारम्भ कर्मभूमिमें उत्पन्न हुआ और सर्वप्रकारकी उपर्युक्त योग्यताका धारण करनेवाला मनुष्य सामान्य केवली, श्रुतकेवली और तीर्थंकर इन तीनोंमेंसे किसी एक के चरण-सान्निध्यमें रहकर करता है। इसका कारण यह है कि क्षायिकसम्यक्त्वकी प्राप्तिके लिए जिस परम विशुद्धि और विशिष्ट देशनाकी आवश्यकता है, वह उनके अतिरिक्त अन्यत्र सम्भव नहीं है । दर्शनमोहकी क्षपणा करने के पूर्व उसका वेदकसम्यग्दृष्टि होना आवश्यक है। वह मिथ्यात्वका पहले क्षय करता है, तत्पश्चात् सम्यग्मिथ्यात्वका क्षय करता है और उसके अनन्तर सम्यक्त्वप्रकृतिका क्षय करके क्षायिकसम्यग्दृष्टि बन जाता है। यदि इस सम्यक्त्वप्रकृतिका क्षय करते हुए किसीकी आयु समाप्त हो जाय तो थोडासा जो कार्य शेष रह गया है, वह चारों गतियोंमेंसे जहां भी उत्पन्न हो, वहां उसे सम्पन्न कर क्षायिकसम्यग्दृष्टि बन जाता है । Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org .
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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