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________________ ४, १, ४ ] दिअणियोगद्दारे मंगलायरणं [ ५११ जीवको उपयुक्त भावजिन तथा जिनपर्याय से परिणत जीवको तत्परिणत भावजिन जानना चाहिये | इन सब जिन भेदोंमें यहां तत्परिणतभावजिन और स्थापनाजिनको नमस्कार किया गया है । स्थापना जिनमें चूंकि तत्परिणत भावजिनके उन गुणोंका अध्यारोप किया जाता है, अतएव उनको नमस्कार करना भी मंगलकारक है। मंगलका अर्थ पाप-मलका गालन होता है । सो वह मंगलकर्ता विशुद्ध परिणामोंके अनुसार जिस प्रकार तत्परिणतभावजिनको नमस्कार करनेसे होता है उसी प्रकार स्थापनानिक्षेपके आश्रयसे जिनमें तत्परिणतभावजिनके गुणोंका अध्यारोप किया गया है उन जिनप्रतिमाओंको भी नमस्कार आदिके करनेसे सम्भव है । जिन तो यथार्थमें वीतराग हैं, अतएव वे स्वयं किसीके पाप- मलका विनाश नहीं करते हैं, किन्तु उनके आश्रयसे स्तोता के परिणामों के अनुसार उसके पापका विनाश स्वयमेव होता है । यहां 'जिन' शब्द से पांचों ही परमेष्ठियोंका ग्रहण समझना चाहिये कारण यह कि सकलजिन और देशजिनके भेदसे जिन दो प्रकारके हैं । इनमें जो घातिया कर्मोंका क्षय कर चुके हैं वे अरहन्त और सिद्ध तो सकलजिन कहे जाते हैं। साथही आचार्य, उपाध्याय और साधुभी तीव्र कषाय, इन्द्रिय एवं मोहके जीत लेनेके कारण देशजिन माने गये हैं । णमो अहिजिणाणं ॥ २ ॥ अवधिजिनोंको नमस्कार हो ॥ २ ॥ गुण और गुणीमें अभेदकी विवक्षासे यहां 'अवधि' शब्द से अवधिज्ञानियोंको ग्रहण किया गया है । जो महर्षि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र स्वरूप रत्नत्रयके साथ देशावधिक धारक हैं उन महर्षियोंको नमस्कार है, यह सूत्रका अभिप्राय समझना चाहिये । णमो पर मोहिजिणाणं ॥ ३ ॥ परमावधिजिनोंको नमस्कार हो ॥ ३ ॥ 1 देशावधि, परमाधि और सर्वावधिके भेदसे अवधिज्ञान तीन प्रकारका है । इनमें से देशावधिके धारक जिनोंको पूर्वसूत्रमें नमस्कार करके अब इस सूत्र के द्वारा परमावधिके धारक जिनोंको नमस्कार किया जा रहा है । परम शब्दका अर्थ श्रेष्ठ या उत्कृष्ट होता है । तदनुसार जो देशावधिकी अपेक्षा उत्कृष्ट अवधिज्ञानके धारक महर्षि हैं उनको इस सूत्र के द्वारा नमस्कार किया जा रहा है । यह परमावधिज्ञान चूंकि देशावधिकी अपेक्षा महान् विषयवाला होकर मन:पर्ययज्ञानके संमान संयत मनुष्यों में ही उत्पन्न होता है, अपने उत्पन्न होने के भवमें ही केवलज्ञानकी उत्पत्तिका कारण है, और अप्रतिपाती अर्थात् सम्यक्त्व व चारित्रसे च्युत होकर मिथ्यात्व एवं असंयमको प्राप्त होनेवाला भी नहीं हैं; इसलिये उसे देशावधिकी अपेक्षा श्रेष्ठ समझना चाहिये । णमो सोहिजिणाणं ॥ ४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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